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वर्ष: 2, अंक 21, अक्टूबर(प्रथम), 2017



रेवड़ियां बँट रहीं हैं


सुशील शर्मा


                   
शिक्षा का सम्मान बिकाऊ है भाई।
पैरों पर गिरना टिकाऊ है भाई।
तुम मेरे हो तो आ जाओ मिल जायेगा।
मैं अध्यक्ष हूँ मैडल तुम पर खिल जायेगा।
क्या हुआ गर शिष्याओं को तुमने छेड़ा है।
क्या हुआ गर शिक्षा को तुमने तोड़ा मोड़ा है।
क्या हुआ गर माता पिता को दी तुमने हाला है।
मत डरो समिति का  अध्यक्ष तुम्हारा साला है ।
शिक्षा को भरे बाज़ारों में तुमने बेंचा है।
ट्यूशन में अच्छा जलवा तुमने खेंचा हैं।
क्या हुआ गर शिष्यों के संग बैठ सुरा पान किया।
क्या हुआ गर विद्या के मंदिर का अपमान किया।
सम्मान की सूची में सबसे ऊपर नाम तेरा।
नोटों की गड्डी में बन गया काम तेरा।
अपने अपनों को रेवंड़ियाँ बाँट रहे।
दीमक बन कर ये सब शिक्षा को चाट रहे।
योग्य शिक्षक राजनीति में पिसता है।
चरण वंदना का सम्मानों से रिश्ता है।
 
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