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वर्ष: 2, अंक 21, अक्टूबर(प्रथम), 2017



अश्रु


सुशील शर्मा


                   
अश्रु जो ढलक गए
स्वप्न जो ललक गए
जीवन के सब रास्ते
चले तुम्हारे वास्ते।

प्यार जो तुमने किया
हृदय जो तुमने दिया
भले करो न प्यार तुम
करेंगे इंतजार हम।

उम्र बीतती गई
रात रीतती गई
सुबह का इंतजार है।
शायद यही तो प्यार है।

आज भी वहीं खड़े
रास्ते में पड़े
छोड़ कर गए थे तुम
कर रहे इंतजार हम।

प्रेम जो कभी तुमने किया
अपना हृदय मुझे दिया।
आज भी इंतजार है।
कहो न मुझ से प्यार है।
 
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