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वर्ष: 2, अंक 21, अक्टूबर(प्रथम), 2017



जब मैं नहीं हूँगा


सुशांत सुप्रिय


                   
जब मैं नहीं हूँगा
तुम मुझे एल्बम की फ़ोटो में
मत ढूँढ़ना

मुझे ढूँढ़ना
आँगन के कोने में उगे
नीम के पेड़ में
जिसकी घनी पत्तियों में
चिड़ियों के घोंसले हैं

मैं हूँगा
सुबह की क्वाँरी हवा में
जिसका सुखद स्पर्श तुम्हें जगा जाएगा
एक नए दिन की
ज़िम्मेदारियाँ निभाने के लिए

तुम मुझे पाओगी
सूर्योदय की लालिमा में
जो तुम्हारे अंतर्मन के
हर अँधेरे कोने को
रोशन कर देगी

मैं तुम्हें मिलूँगा
खेत में काम करते
किसान के हल में
जो बीज को नया जीवन देने के लिए
उर्वर ज़मीन तैयार कर रहा होगा

मैं मौजूद रहूँगा
गर्भवती घटाओं में
जो अपना सारा जल उड़ेल कर
सूखी-प्यासी धरती को
तृप्त कर रही होंगी ...

जब मैं नहीं हूँगा
तुम मुझे अपनी
स्मृतियों के चल-चित्र में
मत ढूँढ़ना

जिसे तुम पहचानती थी
उस देह की केंचुली उतार कर
मैं कब का जा चुका हूँगा

किंतु यदि हृदय से ढूँढ़ोगी तो
पाओगी तुम मुझे फिर से
धूप , हवा , पानी , मिट्टी और
हरियाली के रास्ते ही
कई अलग रूपों में
 
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