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वर्ष: 2, अंक 21, अक्टूबर(प्रथम), 2017



आदरणीय चंद्रकांत देवतालेजी
को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित


संजय वर्मा"दृष्टि"


  
सूर्य उदय से सूर्यास्त तक 
उनकी बदलती किरणों को 
निहारकर 
सुनहरी गुलाबी शब्दो मे
साहित्य की किताबोँ में
रचते रहे सदा 
शब्दों को घूम हो
जाना न मुमकिन सा होता 
कहते किताबें अमर होती
जैसे अमर हुए 
शब्दों में रचे
चंद्रकांत देवताले जी
अनुभवो की झोली से
बाटें साहित्य जगत को
साहित्य के
अनमोल शब्द  
गूँजा करते 
तालियों की करतल ध्वनियां 
औऱ वाह वाह के
शब्दों के साथ 
देवताले जी 
हमारे बीच सदा रहेंगें
जब जब दोहराई जाएगी
उनकी कविताएं 
फिर गुज उठेंगे साहित्य के पांडाल 
साहित्य के आँगन में 
कहते है सूर्य कभी अस्त
होता नही
जैसे देवताले जी 
 
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