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वर्ष: 2, अंक 21, अक्टूबर(प्रथम), 2017



काश मैं बादल होता


रिशु शर्मा


कभी-कभी मैं सोचता हूँ,
की काश मैं बादल होता,
न रंगों की मारा-मारी होती,
सफ़ेद रंग में कमीज़ हमारी होती,
न शक़्ल होती, न दाढ़ी होती,
न जात का ज़िक्र होता,
न धर्म की कहानी होती,
बस आज़ाद परिंदो की तरह,
ये दुनिया हमारी होती।

उन उच्चाईयों को छूने का डर न होता,
न मोहब्बत और इश्क़ में समाज की दख़ल अंदाज़ी होती,
एक हवाँ के झोके के सहारे,
मंजिल हमारी होती,
कहीं जाना होता दूर किसी सफ़र पे,
तो चांद के किनारे जाते,
आराम से ठहर थोड़ा चाँदनी में सुस्ताते,
फिर किसी प्यासे पर थोड़ा पानी बरसातें।

न उम्र में बंधी अपनी तक़दीर होती,
न पापों के प्रायश्चित को गंगा नहाने का बहाना होता,
न पीठ पीछे वार करने वाला ज़माना होता,
टकराते जिससे भी बिजली कड़कती,
न छुपते, न कुछ छुपाने का इरादा होता,
सब एक जैसे दिखते,
और ऊँच-नीच से दूर,
एक हमारा भी आशियाना होता,
कभी-कभी सोचता हूँ,
की काश मैं बादल होता।
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