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वर्ष: 2, अंक 21, अक्टूबर(प्रथम), 2017



नंगी ही हूँ मैं


कुमारी अर्चना


  
नंगी ही हूँ मैं
कम कपड़ो में
बिन कपड़ो के
तो क्या हुआ
जब पुरूष हो सकते है
तो स्त्री क्यों नहीं?
वैसे तो हर कोई नंगा आता
और नंगा ही जाता है
बस नाम का कुछ बित्तों का
सफेद कफ़न जाता है
वो भी शरीर के साथ
आत्मा तो नंगी की नंगी रह जाती!
आज अतिउपभोगवादी समाज में
हर आदमी का दोहरा चरित्र है
अंदर से सब नंगे है
बाहर से ढके है
भड़किले पोशाकों में!
हे पुरूष!
जब तुम मुझे
अपने मन की आँखों से
प्यार भरी नज़रो से देखोंगें
मैं तुम्हें देवी नज़र आऊँगी
तो कभी माँ
तो कभी बहन
तो कभी प्रेयसी
तो कभी पत्नी नज़र आऊँगी
जब अपने बाहरी काम पिपासु
आँखों से मुझे देखोंगे
मैं नंगी नज़र आऊँगी!
कभी हिरोइन तो कभी वैश्या
तो कभी चरित्रहीन
तो कभी अपवित्र नज़र आऊँगी
कैसे देखना चाहते मुझे
ये तुम देख लो!
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