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वर्ष: 2, अंक 21, अक्टूबर(प्रथम), 2017



प्यार कभी न कर लेना!


डॉ० अनिल चड्डा


 
आमंत्रण व्यथा को मत देना,
प्यार कभी न कर लेना!

कल्पना तो कल्पना ही होती,
वास्तविकता जिसमें है सोती,
सपनों की दुनिया में खो कर,
वर्तमान मत खो देना!

प्यार तो है भावों का जंगल,
बहुत ही कम करता ये मंगल,
जीवन कब भावों से चलता,
जीवन नहीं डुबो लेना!

सत्य व्यर्थ नहीं जाता है,
हरदम उभर कर आता है,
झूठे लोगों से डर कर,
साहस नहीं तू खो देना!

लक्ष्य अगर नहीं छोड़ेगा,
कठिन राह भी मोड़ेगा,
हिम्मत हारके जीवन में,
चुपके से मत रो लेना!

सब अपनी-अपनी कहते हैं,
दूजों की नही कभी सुनते हैं,
बहरे घर के बाशिंदों के,
दर पर दस्तक क्यों देना!
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