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वर्ष: 2, अंक 21, अक्टूबर(प्रथम), 2017



हाइकु : दीप आलाप


प्रदीप कुमार दाश "दीपक"


  
 (1) 
आरती थाल
जीवन चक्र राग
दीप आलाप
 (2) 
रे ! लौ संताप
सृजन का आलाप
दीपक राग ।
 (3) 
जलता दिया
बुलंद हैं हौंसले
तन सहमा ।
 (4) 
दीये जलाती
माचिस की तिलियाँ
कभी घर भी ।
 (5)
दीप से मिला
प्रेम की पराकाष्ठा
जला पतंगा ।
 (6)
दीप जो जला
अज्ञान का अंधेरा
भाग निकला ।
 (7) 
साहसी दीप
लड़े अंधकार से
पर आदमी ।
 (8) 
दीपक जला
पर वह तो स्वयं
तम में पला ।
 (9) 
बत्ती जलती
मोम सह न सका
पिघल पड़ा ।
 (10) 
दीप जलता
हृदय में उसके
प्रेम पलता ।
 (11)
दीप निर्मम
प्रेम करने वाले
जले पतंग ।
 (12)
छोटा दीपक
तिमिर हरण का
बने द्योतक ।
 (13)
दीपक जला
रोशन कर चला
जग समूचा ।
 (14) 
अंधेरी रात
एक दीप बता दे
उसे औकात ।
 (15) 
राह दिखाता
हथेली में सूरज
बन के दीया ।
 (16)
दीया तो नहीं
सदियों से जलते
तेल व बाती ।
 (17)
राह दिखाता
जगमग करता
नन्हां सा दीया ।
 (18) 
दीप से दीप
मिल कर मनाते
ज्ञान उत्सव ।
 (19) 
ज्योत से ज्योत
जलता जला दीया
बनी मालिका ।
 (20) 
दीप निर्मम
मिलन के बहाने
जले पतंग ।
 (21)
दीया व बाती
अंधेरे से लड़ने
बनते साथी ।
 (22) 
प्रीत पुरानी
दीया और बाती की
कथा कहानी ।
 (23) 
निशा घनेरी
पर दीपक की लौ
चीर डालती ।
 (24) 
दीप सम्मुख
थकी, हारी व झुकी
निविड़ निशा ।
 (25) 
शब्दों के दीप
सुर की बातियों से
बने संगीत ।
 (26) 
जलता रहा
रात भर दीपक
सिसक रहा ।
 (27)
कहता दीप
आनंद है अमृत
वेदना विष ।
 (28) 
मोम न बनो
पिघल ही जाओगे
इस दीप से ।
 (29) 
जल दीपक
अज्ञानता चीरते
बुझना मत ।
 (30) 
बूढ़ा दीपक
रात भर जागता
दिन में सोया ।
 (31) 
पर्व मनाएँ
शुभकामनाओं के
दीप जलाएँ ।
 (32) 
दीप जलाएँ
तम को पी जाने का
हूनर सीखें ।
 (33) 
दीये तो नहीं
सदियों से जलते
घी और रुई ।
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