Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 2, अंक 21, अक्टूबर (प्रथम), 2017



डॉ० रिक लिंडल द्वारा रचित अंग्रेजी पुस्तक 'The Purpose' का हिंदी अनुवाद
अध्याय 1
[.....पिछले अंक से]
"आपके भौतिक अस्तित्व का उद्देश्य "


लेखक: डॉ० रिक लिंडल
अनुवादक: डॉ० अनिल चड्डा


अगली सुबह, दिन निकलने से पहले, जब वह बिस्तर में अर्ध-निंद्रा की अवस्था में लेटा हुआ था, तो रिक्की ने उस कैप्सूल को खोला जो उसे पुरानी आत्मा ने गृहकार्य के लिये दिया था. एक ही क्षण में, यह ऐसा लगा था कि जैसे उसने पुस्तक की सारी विषय-वस्तु को पढ़ डाला था और आत्मसात कर लिया था.

पुरानी आत्मा ने उससे यह कहा था: “मैं तुम्हे बहुत सारी जानकारी दूंगा, जो इकट्ठी तुम्हारे अंदर आत्मसात हो जायेगी, जिसे मैं आशा करता हूँ कि तुम अपने जीवन के लिये एक मौलिक पृष्ठभूमि की भांति अपनाओगे. यह मार्गनिर्देश जो मैं तुम्हे देने जा रहा हूँ भौतिक संसार में तुम्हे कामयाब होने में सहायता करेंगें.

“शुरुआत में, जैसा कि मैंने तुम्हे कल बताया था, तुम्हे यह जानने की आवश्यकता है कि तुम एक आत्मा हो और तुम एक ही समय में भौतिक ब्रहमांड के बाहर अध्यात्मिक आयाम में भी रहते हो. अध्यात्मिक आयाम तुम्हारा स्थाई घर है.

“तुम प्रवृति से आत्मा हो, जो आत्मबोध से अलग है, चेतना का बहुत ही बुद्धिमान गट्ठा. अध्यात्मिक आयाम में, तुम्हारा सम्बन्ध मित्रों से है और तुम अपना समय वह गतिविधि करते हुए व्यतीत करते हो जिसमें तुम्हे दिलचस्पी है. भावनाओं को जानना एक ऐसा विषय है जिसका अध्ययन करना तुम्हे पसंद है, लेकिन, प्रेम के सकारात्मक पहलुओं के अलावा, उनके प्रभाव को सीधे तौर पर अनुभव करने का आध्यात्मिक आयाम में कोई अवसर नहीं है. ऐसा करने के लिये, तुम्हे दूसरे आयामों में जाना होगा. ऐसा एक आयाम भौतिक संसार है, जिसमें धरती ग्रह है जहाँ तुम जीवनकाल का आनंद ले रहे हो. धरती आत्माओं को अपनी आंतरिक प्रवृति को जानने के लिये और अपनी सर्वश्रेष्ठ साम्थर्य को विकसित करने के लिये एक विशाल नाट्यशाला उपलब्ध कराती है. इस समय, तीन अरब मनुष्य जीवनकाल का रोमांच ले रहे हैं जो औसतन चालीस से अस्सी वर्ष तक का होता है, जो इस पर निर्भर करता है कि वह धरती पर कहाँ रह रहे है. अपनी आत्मा के एक अंश को भौतिक संसार में भौतिक शरीर के माध्यम से प्रकट करके, तुम अनगिनित घटनाओं का सीधे तौर पर अनुभव कर सकते हो जो तुम्हारे धरती पर जीवनकाल में होनी अवश्यंभावी हैं. जो भावुक अनुभव आप पैदा करते हैं वह तब होता है जब आपका उन घटनाओं से सामना होता है और आपको अपनी आंतरिक प्रवृति जानने में सहायता करता है.

"जब तक आप मरने और फिर जीने के निरंतर नियम के बारे में नहीं जानते,
तुम अँधेरी धरती पर केवल एक अस्पष्ट मेहमान हो."
- जोहान्न वोल्फगांग वोन गोएथे

“तुम्हारे भौतिक संसार में जन्म लेने के थोड़ी देर बाद ही, तुमने स्वयं को अपने एक ही समय में आध्यात्मिक आयाम में भी अस्तित्व के बारे में स्मृति को लुप्त करने के लिये प्रेरित किया. तुमने ऐसा अपने आप को धरती पर रहते हुए काम करने के लिये एक स्पष्ट स्लेट देने के लिये किया. फिर भी, आध्यात्मिक आयाम में तुम्हारे जीवन का सहज ज्ञान तुम्हारे साथ रहता है. यह सहज ज्ञान तुम्हारी जागृत होने वाली चेतना पर होने वाले प्रभाव को जानते हुए तुम्हे एक उद्देश्य की भावना और उन गतिविधियों में, जिन्हें आपने अपने लिये अपने जीवनकाल में निर्धारित किया है, लिप्त होने की प्रेरणा देता है.”

“धरती पर जीवन अनिवार्यतः यह जानने के लिये है कि सृष्टि के द्वारा आप क्या बने हैं, अर्थात, उन अनुभवों की रचना जो आप के अंदर भावनाएं भरती हैं, विशेषकर नकारात्मक भावनाएं. जिन भावनाओं का आप अनुभव करते हैं, उनकी जड़ें आपके सम्बन्धों में होती हैं – अपने साथ, दूसरे लोगों के साथ, जानवरों के साथ, भौतिक वस्तुओं के साथ, या विचारों के साथ. आपको पहले से ही अपने जीवन के अनुभवों की गुप्त जानकारी नहीं है, लेकिन तुमने सभी मुख्य घटनाएं अपने जन्म होने से पहले ही चुन ली हैं, जिसमें वो लोग भी शामिल हैं जिनसे आप मिलेंगे और जो आपके जीवन में मुख्य भूमिका निभाएंगे और वह स्थान भी जहाँ आप अपना अधिकतर जीवन बितायेंगे. तुमने ज्यादातर भाग के लिये उन चुनौतीयों को भी चुना है जिनका आप सामना करेंगें, और साथ ही साथ संभावित विकल्पों को भी जो आपके लिये उन परिस्थितियों में से उपलब्ध होंगें जिनमें आप अपने आप को पायेंगें. जब यह परिस्थितियां जिन्हें आपने चुना है प्रकट होंगी, आपके पास जो भी निर्णय आप लेना चाहेंगें उसे ले कर प्रतिक्रिया करने के लिये स्वतंत्रता होगी. उन समय के दौरान, आप यह पायेंगें कि आपको अक्सर उन सीमाओं की हद तक, जितना आप सहन करे सकें, भावनात्मक तौर चुनौतियाँ दी जायेंगी. जब ऐसा होता है, तो तुम्हारी दैविक चुनौती आत्महत्या न करने की, या दूसरे व्यक्ति को न मारने की होगी, आप उन अवसरों पर चाहे जितना भी निराश क्यों न महसूस करें.

"जीवन यह जानने के बारे में है कि
सृष्टि द्वारा रचित आप क्या हैं"

“अपने जीवनकाल में आपका मुख्य कार्य भावनात्मक अनुभवों से सीखना है, जो आप अपने अंदर उन मुठभेड़ों से पैदा करते हैं और जो आपके अंदर होने वाली प्रतिक्रिया को प्रकाश में लाती हैं. ऐसा करके, आप न केवल फिर से यह याद करने में सक्षम होते हैं कि आप क्या हैं (अर्थात स्वयं पर थोपे हुए स्मृति को भुलाने से पहले), अपितु आपको अपनी आंतरिक प्रवृति के बारे में नए पहलू भी पता चलते हैं. यह नई शिक्षा आपको अध्यात्मिक रूप से विकसित होने देती है. इस भौतिक जीवनकाल का यही मुख्य उद्देश्य है. धरती पर जीवनकाल की पुनरावृति के बाद, और जैसे आप स्वयं को अपने सबसे उच्च आदर्श के प्रतिरूप में, जो आप समझते हैं कि आपको होना चाहिए, दोबारा रचित करते रहते हैं, आप अंततः अध्यात्मिक रूप से विकसित हो जाते हैं; आध्यात्मिक आयाम में उच्च दर्जा प्राप्त करते हुए.

पुरानी आत्मा ने जारी रखा, “अब, चेतना हरेक चीज में पैठ जाती है. इसका मौलिक तत्व ‘चेतना इकाई’26 है. चेतना इकाइयाँ भौतिक संसार में जिसका अस्तित्व है वह सब बनाने के लिये असंख्य तरीकों से जुडती हैं. वह, उदहारण के लिये, संयुक्त हो कर अणु बनाते हैं, जो संयुक्त हो कर आवर्त सारणी में सूचीबद्ध मूल तत्व बनाते हैं, फिर बड़े और अधिक जटिल चेतन रूप के संचय बनाते हैं जो कोष्ठिका की, अंगों की, और अंततः अंगो का संकलन रचना करते हैं जो एक साथ काम करके भौतिक शरीर बनाते हैं, वैसी जिसमें इस समय आप वास कर रहे हैं. परन्तु, चेतना इकाइयों का निर्माण सीमित होता है. यह ऐसा निर्माण है जो एक चक्र से हो कर गुजरता है, शुरू से अंत तक. मनुष्यों के लिये और जानवरों के लिये इसे ‘जीवनकाल’ कहते हैं. जीवनकाल के अंत में, यह जटिल ढांचा ख़त्म हो जाता है और अपने मूल तत्वों में मिल जाता है, केवल बाद के समय में दोबारा संकलित हो कर एक नया भौतिक ढांचा बनाने के लिये.

"हमें धरती पर सन्तुलित हो कर चलना चाहिये –
एक पैर रूह में और एक पैर भौतिकता में रख कर."
- लिन्न एंड्रूस

परन्तु, तुम एक आत्मा हो और तुम भौतिक संसार की तुलना में एक आधिक असीमित जटिल चेतना स्वरूप से सम्पन्न हो. तुम्हारी चेतना का अस्तित्व धरती पर भौतिक आयाम से बाहर है, और यह शाश्वत है. यह कभी नहीं मरती, और यह कभी मूल तत्वों में नहीं घुलती, जैसे कि वह चेतना घुल जाती है जो भौतिक संसार में पदार्थ और सभी प्रकार के जीवन स्वरूप बनाती है.

“जैसा कि मैंने पहले कहा था, तुम्हारी आत्मा का एक हिस्सा भौतिक संसार में तुम्हारे भौतिक शरीर के माध्यम से प्रकट होता है. तुम्हारी आत्मा का वृहतर हिस्सा, हालांकि, तुम्हारे देह-धारण के दौरान अध्यात्मिक आयाम में रहता है. इस वृहतर भाग को, मैं अब से, तुम्हारी ‘ऊपरी आत्मा’ कहूँगा, जबकि छोटा भाग जो तुम्हारे भौतिक शरीर में, जिसका वर्णन मैंने अभी किया था, प्रकट होता है उसे मैं तुम्हारी ‘आत्मा’ कहूँगा. तुम्हारी आत्मा, और तुम्हारे शरीर की, जिसका वर्णन मैंने अभी किया था, मौलिक चेतना तुम्हारी ‘आंतरिक पहचान’ बनाने के लिये एक साथ काम करते हैं.

तुम्हारी आंतरिक पहचान बाद में तुम्हारे ‘बाहरी अहम’ का निर्माण करती है. बाहरी अहम भौतिक संसार में देखता है (उपमा के तौर पर, भौतिक शरीर, अपनी आँखों और दूसरी संवेदी प्रक्रियाओं के साथ, जो तुम्हारा गतिवान कैमरा है, जबकि तम्हारा बाहरी अहम इस कैमरे को निदेश देता है और जो रिकार्ड किया जाता है उसे निर्धारित करता है). बाहरी अहम वह केंद्र है जिसके द्वारा भौतिक संसार से सारी सूचना आत्मसात की जाती है और आपके शरूआती मत और विचार बनाने के लिये सम्मिलित की जाती है. यह आपकी जागृत चेतनता है. जो सूचना यह आत्मसात करती है उसका ऊपरी तौर पर विश्लेषण किया जाता है और आंतरिक पहचान में डाल दी जाती है, जहाँ गहरे स्तर पर इसका अर्थ निकाला जाता है इससे पहले कि इसे आत्मा के पास भेज दिया जाये. इन सभी माध्यमों से सूचना सभी दिशाओं में बहती है, इसलिये व्यक्ति, हर समय, अध्यात्मिक आयाम में ऊपरी आत्मा से जानकारी प्राप्त करता और भेजता रहता है तथा ऊपरी आत्मा से धरती पर बाहरी अहम को.

“तो, संक्षिप्त में : चर्चा के लिये, आप अनिवार्यत: चार पहलुओं में बने हैं: (1) आपकी ऊपरी आत्मा, (2) आपकी आत्मा (3) आपकी आंतरिक पहचान, जो आपके भौतिक शरीर और आपकी आत्मा की मौलिक चेतना के एकीकरण से बनी है, और, अंत में (4) आपका बाहरी अहम. ऊपरी आत्मा और आत्मा आपकी रूह है. आपकी आंतरिक पहचान आपकी अचेतनता है, और आपका बाहरी अहम आपकी जागृत चेतना है. अब, इन भिन्न-भिन्न पहलुओं की कल्पना करें कि एक बड़े पिंड की भांति छिन्न-भिन्न और अस्थिर विभाजनों के साथ आप क्या हैं.

“धरती पर जीवनकाल की तैयारी के लिये आपकी ऊपरी आत्मा ने जो पहला काम किया था वह आपके भविष्य के माता-पिता से बातचीत करना और उनके साथ यह समझौता करना था कि वह आपको गर्भ में लेने के लिये इच्छुक होंगें. आपके गर्भ में आने से एक ऐसी प्रक्रिया की शुरुआत होती है जहाँ मौलिक चेतना के कण, भौतिक संसार के अंदर, उस मानव शरीर को बनाने के लिये, जिसके आप स्वामी हैं, एक समूह में आना प्रारंभ कर देते हैं. आपके शरीर का एक भौतिक प्रतिबिम्ब है जो आपके माता-पिता के शरीरों का मिश्रण है, लेकिन इसकी आपके पिछले जीवनकाल के शरीरों के साथ भी अद्भुत समानता होती है.

“गर्भ में आने के कुछ समय बाद, आपकी आत्मा, आपकी आंतरिक पहचान बनाते हुए, भ्रूण की चेतना के साथ सम्मिलित हो जाती है. इस समय के दौरान, आपकी आत्मा ने भ्रूण पर प्रभाव डाला जो अंततः एक वयस्क की भान्ति दिखेगा, और भ्रूण के साथ एक क्रियाशील संबंध बनाना प्रारंभ कर दिया. गर्भावस्था के दौरान यह सम्बन्ध एक सहजीवी सम्बन्ध में विकसित हो गया – अर्थात यह कहना कि, वह शरीर जिस पर आपका स्वामित्व है आपकी आत्मा की उपस्थिति के बिना बच नहीं पायेगा. जब आप अपनी आत्मा को निकाल लेते हैं तो यह मर जायेगा. सहजीवी सम्बन्ध आत्मा के लिये आपके भौतिक शरीर की चेतना के साथ एक अच्छा क्रियाशील संबंध बनाने के लिये और आंतरिक पहचान को विकसित करने के लिये आवश्यक है, जो एक महत्वपूर्ण छोटा स्टेशन है. यह सम्बन्ध आपकी आत्मा को आपके जीवनकाल में आपका शरीर कैसे बढ़ेगा और यह कि बोलने के सभी मामलों में यह कैसे विकसित होगा को प्रभावित करने देगा. यह गर्भावस्था के उस समय में हुआ था कि आपने जानबूझ कर भ्रूण में उस विकास के स्वरूप को प्रेरित किया जिसने आप में हकलाहट और पढने-लिखने में समस्या पैदा की, जिसके बारे में मैंने आपको कल बताया था.”

पुरानी आत्मा ने तब सम्पन्न किया, “एक अलग कथन के रूप में, तुम्हे यह जानने में दिलचस्पी होगी कि तुम्हारी आत्मा तुम्हारे शरीर में निहित नहीं रहती; यह तम्हारे शरीर को ढांपती है, न कि तुम्हारा शरीर इसको. इसकी उर्जा तुम्हारे शरीर में सबसे अधिक घनी होती है, और यह ज्यादा छिन्न-भिन्न और नष्ट हो जाती है जब यह तुम्हारे शरीर के बाहर फैलती है और कुछ ही फीट में पूरी तरह लुप्त हो जाती है. इसीलिये तुम्हे यह आभास हो जाता है कि कोई तुम्हारे पास खड़ा है, तब भी जब तुम उसकी उपस्थिति का पता अपने शरीर की संवेदी प्रक्रियाओं से नहीं लगा सकते. कुछ लोगों में आत्मा के इस विकिरित उर्जा क्षेत्र को देख पाने की क्षमता होती है, जिसे अक्सर दिव्यज्योति कहा जाता है.”

यह रिक्की के “गृहकार्य” की समाप्ति थी.

इस पाठ की धारणाओं की जटिलता के बावजूद, रिक्की, बारह वर्ष की उम्र में, चेतन स्तर पर इस जानकारी का समावेश कर पाया, याद कर पाया, और समझ पाया, जैसे कि कुछ भी इससे अधिक स्वाभाविक न हो. उसकी आत्मा और ऊपरी आत्मा का इस जानकारी को पूरी तरह से समझने के लायक बनाने के लिये स्पष्टत: इस कार्य में हाथ था. इस ज्ञान ने उसके इस संसार को देखने के तरीके को, और इसमें सभी कुछ को, प्रभावित करना शुरू कर दिया, और इसने वह उसके लिये एक ढांचा उपलब्ध कराने की शुरुआत की कि अपने जीवन को कैसे देखता था.

जैसे कि वह बौनी-स्त्री से मिला था, रिक्की ने पुरानी आत्मा से मिलने के बारे में या उसके जागृत स्वप्न के बारे किसी से भी बात न करने का फैसला किया, कम से कम इस समय के लिये.

[क्रमशः........(अगले अंक में पढ़ें "अध्याय 2 - गर्मी का आनन्द और रूह का अस्तित्व")]
www.000webhost.com

कृपया अपनी प्रतिक्रिया sahityasudha2016@gmail.com पर भेजें