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वर्ष: 2, अंक 25, नवम्बर(द्वितीय), 2017



आईना दिखाती


हरिहर झा


  
तूफान, दे थपकी सुलाये,  
डर लगे तो क्या करें? 
विष  में बुझे सब तीर  उर को  
भेद दें तो क्या करें?
 
बर्तन भरा 
मन का लबालब,
ऊपर चढ़ते सुख  की छलकन 
सह ना पाई 
उठती धारा   
रुक न पाई ह्रदय की  धड़कन 
पोछना चाहें तो, चेहरा, 
कीचड़ निकलता हाथ अपने  
भयग्रस्त बैठे कांपते थे  
हा देव! या कुछ और  जपने
दुर्देव  मोटे  गाल  अपने   
फुलाये तो क्या करें।
  
ज्वालामुखी दिखता न, 
सुख की  
लॉटरी मुस्काती सामने  
उल्लास था 
आनन्द इतना  
लो चेतना लगी ऊँघने
जाम ले कर नाचती साकी    
हर्षित हुई थी लालिमा में 
फिर क्यों ढहे सपने 
सभी बस छूमन्तर  हुये कालिमा में  
अब  मौत का आगोश झूला     
झुलाये तो क्या करें?
 
कुण्डली 
जनम की क्या बोले  
थे मौन,  
खोटे सभी सिक्के
डायन डराती 
काल बन कर  
विकृत थे,  अंगोपांग उसके 
सामने आईना दिखाती,  
लिपटी कुकर्मों में जो  वृत्ति  
पापिन बनी इतिहास खोदे  
शव नोचने की दुष्प्रवृत्ति  
बेहोंश करता, बोझ गिर कर   
सुलाये तो क्या करें? 

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