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वर्ष: 2, अंक 24, नवम्बर(प्रथम), 2017



आम आदमी पर सवार बुलेट ट्रेन


राजेन्द्र वर्मा


भारत को फिर से सोने की चिड़िया बनाने को तुले कुछ लोग हैरान-परेशान हैं । अपने तर्कों की गठरी लादे वे शहर-शहर फिर रहे हैं । यों, वे जनता के सेवक कहलाते हैं, लेकिन किसके वास्तविक सेवक है— यह अब जनता से भी छिपा नहीं । अर्थशास्त्र की खटिया खड़ी करने के बाद अब उनकी नज़र रेलवे पर है । उनके अनुसार, रेलवे भारत के हृदय की धड़कन है, लेकिन जब हृदय की नालियों में कचरा भर जाए, तो कोई हृदयवान कब तक अपने प्राणों की रक्षा कर पाएगा ?

विकास के योद्धा जानते हैं कि अपनी रेलवे ख़ासी बुढ़ा गयी है— डेढ़ सौ साल से भी अधिक उमर की हो गयी है । जर्जर पटरियों में बड़े-बड़े गैप हो गये हैं । फ़िश प्लेटें आसमान में उड़ने लगी हैं । पटरी ज़मीन छोड़ रही है ।... आम जनता फिर भी सुरक्षा की क़ीमत पर रेलयात्रा करने को विवश है । बिजली से चलने वाली ट्रेन की छत पर भी लोग सवारी करती है । नब्बे सीटों वाले जनरल डिब्बे में एक सौ नब्बे लोग सामान सहित कैसे सवार हो जाते हैं, रेलमन्त्री की समझ से बाहर है ! उनमें से आधे कहिए, बिना टिकट हों ! क़दम-क़दम पर चेन-पुलिंग अलग से! नतीज़ा यह है कि जो सफ़र चार घंटे का है, आठ घंटे में पूरा हो रहा है ।... ऐसे में भले आदमियों का कितना समय और पैसा बर्बाद हो रहा है, यह वही जानते हैं ! एक्सीडेंट बढ़ते जा रहे हैं । सौ मरते हैं, लेकिन दस को भी मुआवज़ा मिलना मुश्किल है ! घायल मरने का इन्तज़ार करें, तो शायद कुछ बात बने ! रेल मन्त्री बदल दिया गया, फिर भी समस्या सुरसा की तरह मुँह बाये खड़ी है । जिसे देखो, रेल की गर्दन दबाने में लगा है ।

प्रधान मन्त्री चिन्तित हैं : देश की छवि ख़राब हो रही है । देश के निर्माण में योगदान करने वालों के सामने असुविधा बढ़ती जा रही है । उनकी जान का ख़तरा भी उत्पन्न हो गया है । पटरियाँ बदली जाएँ, तो कैसे? इतना पैसा कहाँ से आये? इसकी ख़ातिर कौन-सा देश ऋण देगा? देशवासियों का पेट काटकर अगर पटरियाँ ठीक की जाएँ या, कुछ नयी ट्रेनें चला दी जाएँ, तो भी इस देश के रेलयात्रियों का क्या भला होने वाला है ? ये जनरल बोगी-वाले लोग वैसे ही चलेंगे, जैसे चलते आये हैं ।... लिहाजा देश-हित में बुलेट ट्रेन की कल्पना की गयी है, ताकि फ़िश प्लेटों के उड़ने का चक्कर ही न रहे !

ओवरक्राउडिंग की समस्या ही न उत्पन्न हो ! ज़ाहिर है यह तकनीक कहीं बाहर की होगी । अगर यह तकनीक आयात की जाती, तो करोड़ों-अरबों रुपये खर्च करने पड़ते! लेकिन जापान ऐसा मित्र देश है कि जो न केवल अपनी तकनीक दे रहा है, बल्कि बहुत ही सस्ते दर पर ऋण भी दे रहा है ।

प्रेमचन्द की कहानी, ‘ईदगाह’ सबने पढ़ी होगी । कहानी के हामिद ने पाँच पैसे का चिमटा ख़रीदा था ताकि रोटी बनाते वक़्त उसकी बूढ़ी दादी का हाथ न जले । यह संवेदना की बात है, लेकिन यह पुरानी और दनियानूसी है । आज कहानी के पूँजीवादी पाठ की ज़रूरत है : क़ायदे से उसे पाँच पैसे एडवांस देकर सस्ते ब्याज की दर पर पाँच रुपये का कालीन ख़रीदना चाहिए था, जिस पर वह स्वयं बैठ कर ज़िन्दगी के मज़े लूट सकता था और अपने दोस्तों को बिठाकर अपने घर के वैभव का प्रदर्शन कर सकता था । इसके अलावा कालीन पर बैठ कर हामिद और उसके दोस्त आराम से रोटी खा सकते थे । जहाँ तक हामिद की दादी के हाथ जलने का प्रश्न है, तो इसमें नया क्या है ? दूसरों के लिए अगर कुछ काम किया जाता है, तो हाथ जलते ही हैं ।... फिर हाथ तो अरसे से जलता चला रहा था । अब तक तो उसे हाथ जलाने की आदत भी पड़ चुकी होगी । जब किसी को कोई आदत पड़ जाती है, तो वह छुड़ाने पर नहीं छूटती और अगर कोशिश करके छुडा दी जाए, तो मानसिक सन्तुलन बिगड़ जाता है । इसलिए यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि हामिद की दादी को चिमटे की ज़रूरत थी ही नहीं । तभी उसने हामिद को पाँच पैसे देते वक़्त यह नहीं कहा कि इन पैसों से वह चिमटा लाये । उसे चिमटे की ज़रूरत थी ही नहीं । वास्तव में, हम ग़रीबों को जितना असहाय समझते हैं, उतना वे होते थोड़े ही हैं ? ये साहित्यकार लोग पता नहीं कहाँ से दूसरों की आत्मा में घुसकर उनके दुख-दर्द का ऐसा मार्मिक चित्रण करते हैं जैसे सारा दुख-दर्द उनका अपना भोगा हुआ ही हो ! लेकिन ये कलाकार लोग है— सत्य छुपा देते हैं । सत्य तो यह है ग़रीब या अभावग्रस्त लोग हर परिस्थिति में स्वयं को उसी के अनुसार ढाल लेते हैं ।... हमें उनसे शिक्षा लेनी चाहिए कि कठिनाई में कैसे जीवन जीना चाहिए !

प्रगतिशील प्रधानमन्त्री नये पाठ का पक्षधर है : चिमटा ग़रीबी की निशानी है, जबकि कालीन अमीरी की । जीवन में अगर आगे बढ़ना है, तो सबसे पहले ग़रीबी के निशानों से छुटकारा पाना होगा । छुटकारा न भी मिले, तो क्या दुनिया के सामने ग़रीबी का रोना ठीक है ? आदमी को अपने समृद्ध कल के बारे में सोचना चाहिए, ख़ास तौर पर बच्चों को; क्योंकि वे ही कल के नागरिक हैं । यदि वे समृद्धि का स्वप्न नहीं देखेंगे, तो देश का विकास कैसे होगा ? हम आख़िर कब तक अपने आपको ग़रीब-ग़रीब कहते रहेंगे? हमें विकासशील से विकसित बनना होगा ? और यह तभी सम्भव है, जब हम कुछ बड़ा सोचें— जैसे, बुलेट ट्रेन ! बुलेट ट्रेन हमारे विकास की धुरी है । कल जब देश में सैकड़ों बुलेट ट्रेनें चलने लगेगी, तो दुनिया हमारी ओर हसरत-भरी निगाहों से देखेगी और देश में इन्वेस्टमेंट का ढेर लग जाएगा । इतनी विदेशी पूँजी बरसेगी कि गाँधी जी की आत्मा प्रसन्न हो जायेगी ! इण्डिया दुनिया में छा जायेगी । जब दो प्रतिशत उद्यमियों के सपने पूरे होंगे, तभी तो अट्ठानबे प्रतिशत के घरों में चूल्हा जलेगा ! फिर उनके सपने भी पूरे होंगे ! हमारा ध्येय है कि समाज के अन्तिम व्यक्ति के चेहरे पर हँसी हो !

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