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वर्ष: 2, अंक 24, नवम्बर(प्रथम), 2017



मानवीय संवेदनाएं बयां करती हैं कहानियां-
'शाम के पहले की स्याही’[पुस्तक समीक्षा]


जनकदेव जनक


‘शाम के पहले की स्याही’ लेखिका श्रीमती तुलसी देवी तिवारी का सांतवां ‘कहानी-संग्रह’ है। इसमें 11 कहानियां हैं, जो कभी दाम्पत्य जीवन के अनछुए पहलुओं को छूती हैं, तो कभी जीवन की सरसता पर मधुमास की चपलता का आभास दिलाती हैं। इन कहानियों में पाठक के मानवीय जीवन के विभिन्न रंगों को देखने, परखने और उसमें समाहित होने के लिए आत्मसात हो जाता है। मानवीय संवदेनाएं बयां करतीं इन कहानियों को पढ़ने से पाठक को पर बार-बार अविस्मरणीय अनुभूति होती है, जो लेखिका तुलसी देवी तिवारी की कहानियों को अन्य कथाकारों से अलग करती हैं। कहानी के पात्रों के माध्यम से कथाकार अपने विचारों को जबरन बोलवाता नहीं है, बल्कि कथानक की मांग के अनुरूप रखती है। इन विचारों को वह पुरखों से चली आ रही सामाजिक कुरीतियों व रिवाजों को धता दिखाती हुई बदले परिवेश की व्यावहारिक सोच को प्रस्तुत करती है।

कहानी संग्रह की पहली कहानी ‘हैरत’ है, जो सौतिया डाह की जीवंत प्रस्तुति है। इसमें नायिका दाम्पत्य-सुख से वंचित होते हुए भी अपने घर को संभाल कर रखती है, उसे टूटने नहीं देती है। अपनी इच्छाओं को मारकर सास की सेवा में तन और मन को समर्पित कर देती है। उसका पति भिलाई के सरकारी सिंचाई विभाग में पंप ऑपरेटर है, जो भिलाई में ही रहता है। पत्नी को मां, बच्चोंऔर खेत-बाड़ी की देख-रेख के लिए गांव में छोड़ दिया है। अपने भिलाई में एक रखैल के साथ मस्त रहता है। पति एक बार गांव आता है और अपनी पत्नी को भिलाई ले जाता है। नायिका को अपने घर में कभी रजाई ओढ़ने को नहीं मिली थी। उसके मायके से मिली भी थी, तो सास ने उसे इज्जत व मान-सम्मान के लिए संदूक में रख दिया था। पति ने उसे ट्रेन की बर्थ पर सोने को कहा। उसके लेटने पर नई रजाई ओढ़ा दी। रजाई ओढ़ने पर नायिका का मन प्रसन्नचित्त हो उठा। वह रजाई में लेटी-लेटी सोचने लगी, ‘‘जैसी रजाई कोई ताबीज हो और वह मंत्र लिखित भोजपत्र। यह किसे दिखा रहा है शराफत, मैं तो उठने वाली नहीं।’’ सौतिया डाह का इससे बेहतर नमूना क्या हो सकता है। पति को कोसा, ‘‘हां, देखो माघ-पूस के जाड़े में कटाई-बोआई करके, कितनी चिकनी होती है चमड़ी वह जो कूलर, पंखा, टीवी, फ्रीज, क्रीम, पाउडर जो चमक रहा है चेहरा। उससे दूर तो ठीक है, परन्तु तुम से दूर क्यों रहूं ?’’ दूर रहकर पूरी जिंदगी बीत गई। अब तो सांझ-बाती का समय आ रहा है।’’

दूसरी कहानी ‘मेरा घर’ है। इसमें कहानी का नायक अभि बेरोजगार तो है, लेकिन स्वाभिमानी है। उसका बड़ा भाई सोमू इंजीनियर है। उसने रूचि से प्रेम विवाह किया। बचपन से अपना घर न होने का मलाल उसे या धन आने के बाद एक घर बनाया, जिसपर उसके ससुर और पत्नी का कब्जा रहता था। अभि और उसकी मां की हालत उस घर में नौकर से भी बदतर था। रोज-रोज की प्रताड़ना से ऊबकर अभि एक दिन भाग जाता है। किस्मत अच्छी थी उसकी। एक सेठ अपने काम पर रख लेता है। एक दिन अभि घर पहुंचता है और मां को बताता है कि उसने एक घर बनाया है। गृह प्रवेश के मौके पर अपने भाई को भी आमंत्रित करता है। उसकी मां, भाई, भाभी आदि पहुंच कर उसका आलिशान घर देखकर चकित रह जाते हैं। सभी हैरान हैं कि इतने कम समय में इतना बड़ा घर कैसे बना लिया। तब, अभि अपनी मां को बताता है कि सेठ की बीमार बेटी को अपना किडनी दान किया है। इसी के एवज में सेठ ने घर बनवा दिया। अभि के त्याग, बलिदान और स्वाभिमान पर उसे खुशी तो नहीं हुई, पर उसके दिल ने कहा, ‘‘बेटा महंगा सौदा कर लिया।

कहानी ‘मिरची का अचार’ पारिवारिक जीवन की संघर्षपूर्ण व्यथा-कथा है। परंपरावादी ब्राह्मण परिवार में संजय ने एक माह की एक कुतिया पाल रखा था, जिसका नाम टफी था। टफी संजय की पत्नी देवकी और मां प्रभा को छोड़ कर सारे परिवार की खिलौना थी। उस घर में जहां इच्छा होती , वहां तक दौड़-घूम लेती थी। यहां तक की पूजा घर और रसोई घर भी अछूता नहीं रहता था, जिसके कारण टफी से देवकी और प्रभा नाराज रहती थी। एक दिन टफी ने छत पर सूखने के लिए रखे गए मिरचा के अचार में पेशाब कर दिया। उसे देख देवकी ने उसे मारना चाहा, तभी टफी भाग कर गली में चली गयी। जहां आस-पास के कुत्तों ने उसे घेर लिया। कुत्तों की भौं-भौं की आवाज सुनकर घर में सोया हुआ संजय बौखला गया। टफी संजय को जान से भी प्यारी थी। वह टफी को अपने सिर-आंखों पर बैठाये हुए रहता था। गली में कुत्तों से घिरा देखकर वह अपने घरवालों पर आग-बबूला हो उठा। उसका कहना था कि आखिर दरवाजा कैसे खुला, जो टफी बाहर निकल गयी ? इस बात को लेकर घर में संग्राम छिड़ गया।। पति-पत्नी में वाक्युद्ध बढ़कर मारपीट तक पहुंच गयी। देवकी ने ऐलान कर दिया कि घर में या तो वह रहेगी या टफी। घर का शांत माहौल एकाएक तनाव व अवसाद में बदल गया। अंत में, संजय को झुकना पड़ता है। वह टफी को अपने एक मित्र रचना को देने जा रहा है। तभी, देवकी वहां पहुंच जाती है और रचना के हाथों से टफी को लेकर अपनी गोद में खेलाने लगती है। तब रचना कहती है कि आपको तो टफी से प्रॉब्लम है ना ? इस पर देवकी जवाब देती है कि अपने घर के सदस्यों से प्रॉब्लम कैसा ? घर में छोटी-छोटी बातें होती रहती हैं।

कहानी ‘पांचवी बेटी’ पारिवारिक कहानी है। कम पढ़े-लिखे खबरची बाऊजी की कल्पना पांचवीं बेटी है, जिस ने घर को परिस्थितियों से उबारने के लिए अपने तन को एक सेठ के यहां 10 लाख रूपये में गिरवी रख दिया है। जबकि उसके मन-मंदिर का देवता निषंक था, जिससे वह बेहत प्यार करती है. लेकिन उसकी मां बड़ी बहन मनोरमा से शादी करना चाहती थी। आखिर में जब सारी बातों की जानकारी निषंक को होती है, तो वह कल्पना को उस नरक से निकाल कर कहीं अनजान जगह के लिए प्रस्थान करता है। कल्पना से कहता है कि दुनिया में सभी व्यक्ति सौदेबाज नहीं होते। हम तुम तो एक-दूसरे के लिए बने हैं।

कहानी ‘शक्तिपात’ अंधविश्वास पर अच्छी कहानी है। भगवान के नाम पर आज किस तरह लोगों को ठगकर पाखंडी अमीर बन रहे हैं, लेखिका ने इसका वर्णन बड़े अच्छे ढंग से किया है। शक्तिपात के नाम पर बड़े-बड़े आयोजन होते हैं, लेकिन जनता को क्या मिलता है ? भूखी-प्यासी जनता जबतक उसके कारनामे को समझ पाती है, तबतक उसका सबकुछ लुट जाता है। पाखंडी बाबा चमत्कार दिखाकर अंधविश्वासी जनता को मुर्ख बनाते हैं. कहानी संग्रह की शीर्षक कहानी ‘शाम के पहले की स्याही’ उत्कृष्ट रचना है। मानवीय पीड़ा को नेहा और अमिता ने जिस तरह झेला, वह विरले ही देखने को मिलता है। अन्य कहानियां ‘शेर की मूंछे, आना प्रभात का, पर्वत से राई, राई से पर्वत, वहीं थी, इसके आगे भी ’ कहानियां पठनीय है। इन रचनाओं का कथा प्रवाह, कथा निर्वाह, शैली और भाषा परिपक्व है।

समीक्षित कृतिः- ‘शाम के पहले की स्याही’ (कहानी -संग्रह)
लेखिकाः- श्रीमती तुलसी देवी तिवारी
मूल्यः- 300 रूपये मात्र
संस्करणः- प्रथम
प्रकाशकः- पंकज बुक्स
109-।, पटपड़गंज, दिल्ली-91
वितरकः- भावना प्रकाशन, दिल्ली-91
सम्पर्कः- बी/28, हरसिंगार, राजकिशोर नगर,
बिलासपुर, छत्तीसगढ़।

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