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वर्ष: 2, अंक 24, नवम्बर(प्रथम), 2017



बाऊल बाऊलगान और विश्व कवि रवीन्द्रनाथ


डॉ. रानू मुखर्जी


बाँग्ला के बाऊलों के विषय में सर्वप्रथम सदार्थक रचना और अनुकूल मत – मंतव्य मिलता है विश्व कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर की रचनाओं में। बाऊलों की अंतरतम सत्यानुभव ने उन्हें इतना उद्वेलित कर दिया था कि उनकी रचनाओं का संग्रह और प्रकाशन उन्होने कुंठा हीन होकर किया। एतिह्य के पथ पर चलायमान इन मुक्त साधकों की चर्चा और सत्यानुसंधान दोनों एक बिंदु में मिल गए थे। कवि ने समाजविज्ञान की धारा में या समाज – नतöत्व की विरचनाओं का संग्रह और प्रकाशन उन्होने कुंठा हीन होकर किया था। एतिह्य के पथ पर चलायमान इन मुक्त साधकों की चर्चा और सत्यानुसंधान दोनों एक बिंदु में मिल गए थे। कवि ने समाजविज्ञान की धारा में या समाज – नेतöत्व की विद्या चर्चा अनुसार समझना नहीं चाहा। उनके प्रच्छन गोष्टी जीवन एकक परंतु संहत समाज जो समान रुप से मर्मी परंतु प्रतिवादी भी है उसको उनहोने अनुभावन करना नहीं चाहा। बाऊल गीत उनको एक मानव के आंतरिक उच्चारण की तरह लगा।

बीरभूम जिला के निवासी आदित्य मुखोपाध्याय बहुत दिनों तक गाँवो में घूम घूमकर बाऊलों के संग रहे और बहुत नजदीक से उनका निरीक्षण भी किया था। केंदुली के मेले भी गए। उनकी व्यक्तिगत धारणा यह है कि आजकल के अधिकांश गायक बाऊल कुछ विदेशियों के संगत से नष्ट भ्रष्ट हो रहें हैं। जिससे गीत का भाव तथा कंठ संपद का ह्रास हो रहा है।

गवेषक शक्तिनाथ झा के अनुसार, बाऊलों की जीवन प्रणाली, मानव को अपनाने की है। उनके वाद्ययंत्र गीत के ताल में रोचकता तथा विशिष्टता प्रदान करते हैं। इससे विदेशी आकर्षित होते है और बाऊलों के साथ मिल जुलकर नृत्य गान करने लगतें है। समय के साथ – साथ भाषा और बोली का भी समावेश आपस में हो जाता है।

बाऊल शब्द आजकल एक generic संज्ञा की तरह हो गया है। अधिकांश लोग बाऊल बनना चाहतें है। यथार्थ बाऊल कौन है? क्या है उसकी जीवनाचरण, उसका करण-कारण, उसका अंग वास क्या है? कोई पटूली श्रोत सहजिया है, कोई जात वैष्णव, कोई साहब धनी है, कोई मतूआ पंथी है, कोई योगी – सब मिल जुलकर बाऊल परिचय में रच पच गए हैं – क्योंकि बाऊलों की ग्रहणीयता समाज में आजकल बहुत व्यापक रुप में है। कूष्टियां अंचल के फकीर सफेद झब्बा पहनतें हैं, घुघराले बाल रखतें हैं और अपने को बाऊल कहते हैं। और फिर पश्चिमबंग के चोटीवाले गेरुआधारी भी बाऊल हैं वही यथार्थ में बाऊल है जबकि दूसरे लोग अन्याय रुप से अपना बाऊल नामकरण कर रर्हें है।

बंगाल में शिक्षित श्रेणी के बाऊल और बने हुए बाऊलों द्द्वारा रचित बाऊलगान की परंपरा है। सूधीर चक्रवर्तीजी के अनुसार पुरुलिया में “साधुगान” नामक एक प्रकार का गान प्रसिद्ध है जो कि बाऊलगीत के समकक्ष है। देह तत्व, सहज साधना – वैराग्य आदी बाऊलगान के विषय सभी साधुगान में देखें जाते है। साधारणतः बाऊल गान को जिले की सीमओं में बाँधकर निरीक्षण नही किया जा सकता है। अपितु अंचल निर्धारण सहज है। जैसे राढबंग को ही लिया जाए। बीरभूम, बर्धमान, मूर्शिदाबाद की सीमओं में बाऊलगान अधिक संपन्न है। पश्चिम सीमांत राढ की बांकूडा जिला के बहुत अंचल में बाऊलों का निवास देखा जाता है। परंतु इस अंचल में आचरणवादी या गायक बाऊल प्रायः नहीं है। नदिया, कुष्टिया, पाबना, जशोहर में बहुत पुरानी बाऊल परंपरा आज भी प्रवाहमान है। मूर्शिदाबाद तथा नदिया के ग्रामांचल में हिन्दु – मुसल्मान में भावों का आदान – प्रदान आज भी बहुत जिवीत है – वहाँ के बाऊल तथा फकीरों का कर्म उदाहरण योग्य है। संभवतः मुर्शिदाबाद में बाऊल फकीरों की संख्या सबसे अधिक है। बाऊल कहने पर किवदंती की तरह “बीरभूम के बाऊल” शब्द प्रसिद्ध है। इसका सबसे बडा कारण है स्थान का महत्व। एक तरफ “जयदेव केंदुली का मेला” दूसरी तरफ “शांतिनिकेतन क पोष मेला” और भी एक कारण है वो है व्यक्ति का महत्व – जिसके मूल में है नवीनदास और उनका विख्यात पुत्र पूर्णदास।

जयदेव का पोष संक्राति का मेला शायद सबसे वृहत परिसर वाला मेला है। यहाँ पर बहुत समय से अनेक बाऊल साधक और गायक आते हैं। यहाँ के बाऊल गान को न सुना हो ऐसा व्यक्ति बंगाल में विरल है। कलकत्ता तथा अनेक बडे शहरो से बाऊल रसिक लोग आतें हैं। लेखक, शिल्पी, अभीनेता, अध्यापक, संवादिकों के लिए केंदुली एक पीठ स्थान है। आवाध गंजिका सेवन तथा गीतों का आकर्षण लोगों को वहाँ खींच ले जाता है। खांटी बाऊलगान के लिए यह एक निर्भर योग्य स्थल है। मनहरदास, त्रिभंग ख्यापा, निताई ख्यापा, राधेश्याम जैसे प्रसिद्ध बाऊल तथा और अनेक ऐसे प्रसिद्ध बाऊल थे जिनका आवागमन केंदुली में होता था। नवीनदास बाऊल भी यहाँ आते थे। यहाँ पर आकर बहुत दिन रहने के बाद प्रयात हुए थे सूधीरबाबा। आज भी अनेक बाऊल यहाँ स्थायी रुप से रहतें हैं। केंदुली का मेला इतना विख्यात है कि सारे भारत से बहुतर उपासक, विभीन्न संप्रदाय के साधक यहाँ पर आकर धन्य हो जातें है। बांग्ला के बाऊलों के प्रचार – प्रसार तथा प्रतिष्ठा भूमि के रुप में केंदुली सबसे सजीव केंद्र है। रवीन्द्र परिमंड्ल तथा शांतिनिकेतन भी केंदुली के पास में ही स्थित है। केंदुली के प्रसिद्धि का यह भी एक उत्स है।

क्षितिमोहन, प्रभातकुमार मुखोपाध्याय, नन्दलाल वसु (विख्यात चित्रकार), रामकिंकर तथा शांतिदेव ने बहुत बार वहाँ का भ्रमण किया था। बीरभूम के बाऊलों के प्रसिद्ध होने में रवीन्द्र परीकरों क उत्साह – उद्दीपना ने बहुत अहम भूमिका निभाई है। शांतिनिकेतन के आश्रम में बाऊलों का सदा स्वागत होता है। नवीनदास के समय से ही शांतिनिकेतन के गुणी आश्रमवृंद तथा वहाँ के गुणग्राही छात्रों ने सदा ही बाऊलों का परीपोषण किया है। आजकल बंगाल के बाऊलों का जो प्रवल आदर है उसके मूल में अनेक कारण हैं – एक अन्यतम कारण है बंगीय शिल्पीयों के द्वारा चित्रित विगत आठ-दश दशक व्यापी बाऊल चित्रकला। नंदलाल, रामकिंकर, सत्येन वंदोपाध्याय, सूधीर खास्तागीर, सोमनाथ होर , से लेकर कलाभवन के नवीनतम चित्रकार लगातार बाउलों का चित्र और पोट्रैट बना रहें हैं। कलाभवन के छात्र पंकज वंदोपाध्याय, बीरभूम के पटेलनगर में रहकर बाऊलों के शताधिक चित्र बनाए है जिससे कि बाऊल जीवन की विचित्र रुपावली से लोगों का परीचय को सके। बंग संस्कृति में बाँगलागान के क्षेत्र में बऊलों के चिरकालीन अवदान की तरह चित्रकारों द्वारा अंकित चित्रवली भी हमारी भिसूआल एस्थेटिक्स का गौरवमय अर्जन है।

बाऊल और शांतिनिकेतन एक सुदिर्घ युगलबंदी है और इसका आरंभ रवीन्द्रनाथ से है। बोलपुर के आसपास बाऊलपाडा है। नवीनदास प्रायः ही रवीन्द्रनाथ को गान सुनाने आया करते थे। कुछ दिन तक साथ रहे। पर एक जगह अधिक दिन तक टिककर रहना उनके स्वभाव में नहीं था। दूसरी जगह चले गए पर तभी से आज-तक बाऊलों का शांतिनिकेतन में आना नियमित हो गया है। अध्यापक तथा छत्रों को गीत सुनाना उनको प्रिय है क्योंकि रवीन्द्र्नाथ उनके स्म्मान्नीय हैं। एक स्म्मेलन में बाऊलों के विषय मे कहा गया है ---- “पहले की तुलना में आजकल बाऊलों की अवस्था में काफी फर्क है। आजकल के लोग उनको अलग नजर से देखने लगें हैं। पहले के बाऊलों की जिवीका भिक्षावृति पर निर्भर थी। वर्तमान के अर्थसामाजिक व्यवस्था के कारण बाऊलों का दैन्य समाज के लिए लज्जा का विषय है। पहले के बाऊल आश्रमवासी होकर ही जीवन बीताते थे परंतु आजकल के बाऊल गृहवासी बनने लगें हैं। फिर भी वे दरिद्र है। खेतों में कठिन मेहनत कर्के भी वो लोग बाऊल संगीत को जीवित रखने का प्रयास कर रहें हैं। बाऊलों का दरिद्रता, शिक्षा, स्वास्थ्य की सम्स्या बहुत गंभीर है। यह सुखकर है कि विभिन्न प्रतिष्ठान आजकल इस विषय पर काम कर रही है।” दरअसल हम बाऊलों के विषय में एक बात को भूल रहें हैं कि जब वह हाथ में एकतारा लेकर बाऊलगान में विभोर होता है तो वह एक अन्य जगत में होता है। और जब घर गृहस्थी के बीच में होता है तो वह एक साधारण मानस होता है। उनके गान के जो शब्द हैं, “इस मानुष में वह मानुष (एई मानुषे आछे सेई मानुष)” इस परिवेश में एकदम सही होता दिखता है। साधारण गरीब, सुयोग सुविधाहिन, असहाय मानुष के अंदर एक दुसरा मानुष है, वही मानुष बाऊलगान गाता है।

स्वयं अपनी बखान करना पाप है – गुरु का निषेध है। विपरित रुप में कहते हैं, “आप गुणी – ज्ञानी मान्यजन हैं, हमारा पथ तो ज्ञान का पथ नहीं हैं – हम भाव के रसिक हैं। जो कुछ भी जानता हूँ वह भी महानजनों के पद है या फिर उनकी महज वाणी है – वो भी गुरु के सिखाए हुए है।”

गाँव में रहनेवाले विच्छिन्त्र तथा असंगठित बाऊलों क अस्त्र केवल उनका कंठ संगीत है और है अंतर का तिव्र विश्वास, अनुमान पर विश्वास नहीं करते। उनके अनुसार शात्र – पुराण – देवमुर्ति – मंत्र – तिर्थ उपवास सब दरअसल अनुमान पर आधारित है। केवल “वर्तमान” सत्य है। खुदा या ईश्वर मानव जीवन में ही शरीक हैं, अतः मानुष को छोडकर साधना संभव नहीं है। उनके गान में है –

मानुष होकर मानुष जानो (मानुष होए मानुष जानो)
मानुष होकर मानुष पहचानो (मानुष होए मानुश चेनो)
मानुष होकर मानुष मानो (मानुष होए मानुष मानो)
मानुष रतनधन । (मानुष रतनधन)

मध्ययुग में एक बांगला काव्य में “बाऊल” शब्द प्रयोग को देखकर पंडित लोगों ने यह अनुमान लगा लिया कि बाऊल धर्म सुप्राचीन है। परंतु क्या बाऊल एक धर्म है? इसका अभी तक कोई मिमांशा नहीं हुआ है। बाऊल एक मौलिक शब्द “बातुल” शब्द से आया है। बातुल का अर्थ है “पागल” दूसरे दल का मानना है “व्याकुल” शब्द से बाऊल शब्द की उत्पति हुई है क्योंकि बाऊल आत्मानुसंधान के लिए व्याकुल हैं।

बाऊल विशेषज्ञ क्षितिमोहन सेनजी के अनुसार, “वे लोग मुक्त पुरुष हैं। अतः समाज का कोई बंधन उन्हें स्वीकार नहीं है। परंतु समाज उन्हें अपने से क्यों अलग करेगा? तब उन्होने कहा कि ‘हम तो पागल हैं हमें छोड दो। पागल का कोई दायीत्व नहीं होता।’ बाऊल का अर्थ है “वायु ग्रस्त” अर्थात पागल”।

इस उक्ति के अनुसार एक ने लिखा, वायु + ल = बाऊल। दूसरे ने कहा, हिंदी का “बऊर” ही बांगला में बाऊल हो गया है। अध्यापक असित कुमार वंदोपाध्याय के अनुसार, “चैतन्यचरित्रामृत ग्रंथ में ‘ईश्वर प्रेम में मगन, वस्तव ज्ञान वर्जित, उदासीन भक्त’ इस अर्थ में बाऊल शब्द का एकाधिक स्थान में प्रयोग हुआ है। “अरबी – फारसी – भाषा के पंडित हरेन्द्रचन्द्र पालजी का कहना है की “आउलउयली” शब्द से आउल – बाऊल शब्द का जन्म हुआ है। गीतकार दूद्दु शाह ने एक गीत में कहा है, जो मानुष में खुदा को खोजता है वही तो है बाऊल (जे खोंजे मानुषे खोदा सेई तो बाऊल)” एक जन ने कहा, अरबी में “बा” अर्थात आत्मा “ऊल” अर्थात संधान करना, खोजना, इससे बाऊल का अर्थ हुआ, आत्मानुसंधानी।

बाऊलों क एक सुनिर्दिष्ट वहिरावरन है। एक उक्ति उदघृत करती हुँ – केशविन्यास से वे स्पष्ट पहचाने जा सकते हैं। गेरुंआ वसन परिधान करते हैं। हाथ में लोहे की बाला, काँख में दीर्घ चिमटा, गले में पत्थर की माला और एक हुक्का (जिसके द्वारा गाँजा सेवन करते हैं) जिसमें लंबा नल लगाया हुआ और उसमें गांजा भरा हुआ, जय बोबुम, बोबुम गुरु सत्य कहते हुए दोनों । आँखो को बंद करके गाँजे में दम भरते रहतें हैं।

लालशशी, लालन, पांजू शाह, रशीद, दूद्दु, राधारमण, हाऊडे, गोंसाई, कबिर, जोदूबिंदू, जलाल दीन शरत, फूलवासौद्दीन, दूर्विन शाह, पद्मलॉचन, शलिला शाह, हसन राजा से लेकर आजतक प्रवाहित बाऊल वर्गो का गान हमारे लिए गर्व का विषय है। इनमें से सभी शायद परम अर्थ में बाऊल नहीं हैं परंतु बाऊलों में श्रद्धेय तथा ग्रहणिय हैं और यह भी सच है कि बाँगला के सामजिक इतीहास में बाऊल के आचरण और चारचन्द्र को लेकर आजतक कभी कोई तर्क नहीं उठा। निम्नवर्ग तथा उच्चवर्ग तक बाऊलगान का स्वतःस्फूर्त चलाचल प्रायः शतवर्ष से कायम है।

यह भी ध्यान रखने योग्य है कि बाऊल्गान का कोई निर्दिष्ट सूर या घट नहीं होता है अंचल के हिसाब से ये गढे जातें है। यह बात केवल बाऊलों के विषय में ही कहा जा सकता है। अंचल के बदलते बाऊलों की जीवन प्रणाली बदल जाती है। इसलिए राढ देश के बाऊलों से कुष्टिया के बाऊलों की जीवन प्रणाली में समानताओं को खोजना निरअर्थक है। उनके जीवन की उष्णता, पोशाक वरण का धर्म, गान की उदार मानविक्ता, उनका बंधनहीन पथ – एक अलक्ष्य के अन्वेषण की इंगीत देता है। बाँगला के बाऊल एक मग्न श्रोता के जैसे हैं।

आत्मविज्ञापन में बाऊल विश्वास नहीं करतें हैं – अपने कुटीर में भजन – भाजन में ही रत रहतें है। पथ प्रांतर से लेकर मेला महोत्सव में घुमते हैं। गान को तत्व मानतें हैं जिसके तीन पर्याय है – आत्मतत्व, गुरुतत्व, और देवतत्व। इसके सिवाय था दैन्य और मनःशिक्षा का गान। इनका अभाव मन को सालता है।

आचार्य क्षितिमोहन सेन मध्ययुग के संत साधाकों के विशेषज्ञ थे। “बाँगलार बाऊल” नाम से १९४९ में कलकत्ता विश्वविधालय में उन्होंने एक भाषण दिया था जो बाद में एक पुस्तकाकार में निकला। उनके मतानुसार, “ग्रंथाश्रयी पंडित बाऊलिया भाव और धर्म को सठीक पकड नहीं पाए तथा उसका सठीक परिचय देने में भी असमर्थ रहे। जो लोग निग्रंथ हैं उनका परिचय ग्रंथो में कैसे मिल सकता है”।

क्षितिमोहन १९०८ साल में शांतिनिकेतन से युक्त हुए तथा रवीन्द्रनाथ के साथ १९४१ तक लगातार वहीं रहे। उन्होने रवीन्द्रनाथ को बाऊल परंपरा के विषय में अनेक तत्वज्ञान से समöद्ध किया और गुरुदेव के आग्रह किए गए गान भी दिए। गुरुदेव ने उपनिषदिय भावना के साथ “मनेर मानुष” तत्व का समीकरण करने का प्रयास भी किया। दरअसल मनेर मानुष कायासाधन का कनसेप्ट है। गुरुदेव को लालन शाह का “कभी – कभी बंद पिंजरे के अंदर आकर अनजाना पंक्षी (अचीन पाखी) बंधनहीन अनजाने की बात कह जाता है, मन उसे चिरंतन करके पकडकर रखना चाहता है। पर असमर्थ।” असामान्य अनुभव तथा प्रकाश भंगी ने कवि को बहुत आकृष्ट किया था।

बाऊलगान से प्रभावित होकर उन्होने कई रचनाएँ की निम्न उनमें से एक है ---

“मेरे अंतर का मानव मेरे अंतर में ही रहता है (आमार प्राणेर मानुष आछे प्राणे)
मै जिधर भी देखता हूँ उधर वही दिखता है (ताई हेरी ताई सकल खाने)
मेरी नजर में बीजली की चमक में, और में उसे भी खो नहीं सकता
(आछे से नयन ताराय, आलोक धाराए ताई ना हाराई)
यहाँ वहाँ चारों तरफ वही दिखता है (उगो ताई देखी ताई जेताय सेथाय)
जिधर भी में देखता हूँ उधर ही दिखाई देता है (ताकाई आमी जेदिन पाने)”

लालन फकीर का अस्ताना छेऊडिया में हैं। कुष्टिया अंचल में प्रधानतः लालन – पंथी बाऊल रहतें हैं। लालन पंथ बहुत उदार है। गुरु के बदले गुरु माँ, उनके बदले कोई भी तृतीय साधुजन को दीक्षा दान करने का अधिकार है। बाऊल स्वयं को “पथ बैरागी” भी कहतें हैं। लालन की एक तत्व रचना-

“सभी कहतें हैं, लालन जात क्या है इस संसार में। (सब लोके कय, लाल्न की जात एई संसारे)
लालन कहे, जाति का रुप कैसा है, देखा नहीं इस नजर से ।
(लालन कहे, जातिर की रुप, देखलाम ना एई नजरे)
कहीं माला कहीं तसहीब गले में (केऊ माला केऊ तसहीब गले)
तभी तो भिन्न जात हैं कहें (ताई तो रे भिन्न जात बले)
जाते या आते समय फिर (जाओआ किंबा आसार बेलाय)
जात का चिन्ह रह जाता है पडा। (जातेर चिन्ह रय पडे)”

लेख का प्रतिपाद्य आज के बंग प्रदेश में बाऊलों का अवस्थान, उनकी सांसासिक अवस्था, उनके जीवन के छंद, वाणी और सुर के उत्स के संधान को दर्शाना है। इस लेख के माध्यम से मैने पश्चिमबंग के बाऊल पंथ के विषय को सधारण रुप में अभिव्यक्त करने की चेष्टा की है। अंततः कहना चाहुँगी कि बाऊलगान हमारे राष्ट्र का धरोहर है इसका संरक्षण करना हमार फर्ज है। अल्प ज्ञान के लिए क्षमाप्रार्थी हुँ।

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