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वर्ष: 2, अंक 24, नवम्बर(प्रथम), 2017



रक्षक ज़ख्म


डॉ सुषमा गुप्ता


शहर के बड़े सरकारी अस्तपताल में कुछ दिन पहले ही तबादला हुआ था डॉक्टर राहुल का। रोज़ मंदिर का नियम था,शहर आकर भी जारी रहा । मंदिर की सीढ़ियों पर यूँ तो बहुत से भिखारी बैठे रहते थे पर एक महिला पर उनका ध्यान हमेशा अटक जाता । वो आवाज दे-दे कर पैसे नही मांगती थी । शांत सिर झुकाए बैठी रहती।दूर से भी उसकी देह के ज़ख्म साफ दिखते । मक्खियां जो भिन्नभिनाती रहती। बाकी भिखारी भी उससे थोड़ा दूर ही बैठते थे। शुरू में उन्हें लगा कि शायद उस औरत को कोढ़ है पर अब अक्सर उसके सामने पैसे रखते उनकी पारखी नज़र ये समझ चुकी थी कि कोढ़ के ज़ख्म नही है ये ।

"नाम क्या है तुम्हारा ?"

"......."

"इलाज क्यों नही कराती इन जख्मों का?"

"......"

"कोई है नही क्या तेरा ?"

भिखारन ने न मे सिर हिला दिया

"चल मेरे साथ । सरकारी अस्तपताल में मुफ्त में इलाज करा दुंगा।"

वो टस से मस न हुई।

"अरे बड़ी ढीठ है । चल भी।"

"मुझे नही कराना इलाज।"

"क्यों भला? देखा भी है किस कदर मक्खियां बैठी है और कितने घिनौने हो चुके है ज़ख्म। मर जाऐगी इनके जहर से।"

"न ...ऐसे ही ठीक हैं । ये घिनौने ज़ख्म ही रात को वहशी कुत्तों से मेरी रक्षा करते है । शरीर के जख्मों में इतना दर्द नही होता साहब जितना ....." डॉक्टर साहब की ज़ुबान को तो जैसा लकवा मार गया। वो चुपचाप सिर झुकाए चले गए।

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