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वर्ष: 2, अंक 24, नवम्बर(प्रथम), 2017



क्या मै लिख सकूँगा


सुशील शर्मा


 
कल एक पेड़ से 
मुलाकात हो गई। 
चलते चलते आँखों में 
कुछ बात हो गई। 

बोला पेड़ लिखते हो 
संवेदनाओं को। 
उकेरते हो रंग भरी 
भावनाओं को। 

क्या मेरी सूनी संवेदनाओं 
को छू सकोगे ?
क्या मेरी सारी भावनाओं 
को जी सकोगे ?

मैंने कहा कोशिश करूँगा 
कि मैं तुम्हे पढ़ सकूँ। 
तुम्हारी भावनाओं को 
शब्दों में गढ़ सकूँ। 

बोला अगर लिखना जरूरी है
तो मेरी संवेदनायें लिखो तुम।
अगर लिखना जरूरी है 
तो मेरी भावनायें लिखो तुम।

क्यों नहीं रुक कर मेरे 
सूखे गले को तर करते हो ?
क्यों नोंच कर मेरी सांसे 
ईश्वर को प्रसन्न करते हो ?

क्यों मेरे बच्चों के शवों 
पर धर्म जगाते  हो ?
क्यों हम पेड़ों के शरीरों 
पर धर्मयज्ञ करवाते हो ?

क्यों तुम्हारे विद्यालय में बच्चे
मेरी टहनियां फेंक देते हैं ?
क्यों तुम्हारे सामने मेरे 
बच्चे दम तोड़ देते हैं ?

हज़ारों लीटर पानी नालियों 
में तुम क्यों बहाते हो ?
मेरे बच्चों को बूंद बूंद के 
लिए तुम क्यों तरसाते हो ?

क्या मैं तुम्हारे सामाजिक
सरोकारों से इतर हूँ ?
क्या मैं  तुम्हारी भावनाओं 
के सागर से बाहर हूँ ?

क्या  तुम्हारी कलम सिर्फ
हत्याओं एवं बलात्कारों पर चलती है ?
क्या तुम्हारी लेखनी क्षणिक
रोमांच पर ही खिलती है ?

अगर तुम सचमुच सामाजिक
सरोकारों से आबद्ध हो। 
अगर तुम सचमुच पर्यावरण 
के लिए प्रतिबद्ध हो। 

लेखनी को चरितार्थ 
करने की कोशिश करो। 
पर्यावरण संरक्षण को अपने
आचरण में लाने की कोशिश करो। 

कोशिश करो कि कोई 
पौधा न मर पाये। 
कोशिश करो कि कोई 
पेड़ न कट पाये। 

कोशिश करो  कि 
नदियां शुद्ध हों। 
कोशिश करो कि अब 
न कोई युद्ध हो। 

कोशिश करो कि कोई 
भूखा न सो पाये। 
कोशिश करो कि कोई  
अबला न लुट जाए। 

हो सके तो लिखना की 
नदियाँ रो रहीं हैं। 
हो सके तो लिखना की 
सदियाँ सो रही हैं। 

हो सके तो लिखना की 
जंगल कट रहे हैं। 
हो सके तो लिखना की 
रिश्ते बंट रहें हैं। 

लिख सको तो लिखना 
हवा जहरीली हो रही है। 
लिख सको तो लिखना कि
 मौत पानी में बह रही है।  

हिम्मत से लिखना की 
नर्मदा के आंसू भरे हुए हैं। 
हिम्मत से लिखना की 
अपने सब डरे हुए हैं। 

लिख सको तो लिखना की
 शहर की नदी मर रही है। 
लिख सको तो लिखना कि
वो तुम्हे याद कर रही है।

क्या लिख सकोगे तुम 
गोरैया की गाथा को? 
क्या लिख सकोगे तुम 
मरती गाय की भाषा को ?

लिख सको तो लिखना की
 तुम्हारी थाली में कितना जहर है |
लिख सको तो लिखना की 
ये अजनबी होता शहर है |

शिक्षक हो इसलिए लिखना 
की शिक्षा सड़ रही है |
नौकरियों की जगह 
बेरोजगारी बढ़ रही है |

शिक्षक  हो इसलिए लिखना 
कि नैतिक मूल्य खो चुके हैं। 
शिक्षक हो इसलिए लिखना 
कि शिक्षक सब सो चुके हैं। 

मैं आवाक था उस पेड़ 
की बातों को सुनकर। 
मैं हैरान था उस पेड़  के
 इल्जामों  को गुन कर। 

क्या वास्तव में उसकी
 भावनाओं को लिख पाऊंगा?
या यूँ ही संवेदनाहीन 
गूंगा रह जाऊँगा।



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