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वर्ष: 2, अंक 24, नवम्बर(प्रथम), 2017



वो बेबाक कवि है


मनीभाई


कभी कल्पना की पर लगाये।
कभी भटके को डगर दिखाये।
कभी करें हंसी ठिठोली ,
कभी करें क्रांति की बोली।
वह कोई नहीं समाज का उगता रवि है ।
हां ! वो बेबाक कवि है ।।

चारण बन राजा का गुणगान किया।
आत्मविश्वास भर चरित बखान किया ।
भक्तिधारा बहा के,मानव मूल्य संजोया।
काव्य श्रृंगार करके प्रेम का बीज बोया।
रंजन किया जग का,मन में जिसकी छवि है ।
हां ! वो बेबाक कवि है ।।

खादी-कुर्ता,कलम दवात,कांधे में झोली ।
साहित्य सृजनकर्ता वो ,किताब हमजोली।
गुदगुदाया जी भर के, कभी संग हमारे रो ली ।
कुरीति दूर करने को , सहे ताने की गोली ।
जिसकी रचना कोई खोज , हर पुरातन से नवी है ।
हां ! वो बेबाक कवि है ।।
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