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वर्ष: 2, अंक 24, नवम्बर(प्रथम), 2017



मेरी हिम्मत देखकर....


धर्मेन्द्र अरोड़ा "मुसाफिर"


मेरी हिम्मत देखकर जब रास्ते चलने लगे !
मंज़िलों के दीप हर सू खुद ब खुद जलने लगे !!
 
हसरतें दिल की जगी सब थी निहां जो अब तलक !
इन निगाहों में शगुफ्ता ख्वाब फ़िर पलने लगे !!
 
गैर मुमकिन ये गज़ल है कह रहे थे लोग जो !
आज़ अपना सर झुकाए हाथ वो मलने लगे !!
 
शायरी की जब मिरे मन में लगन सी  लग गई !
आँखों आँखों मे हमारे रात दिन ढलने लगे !!
 
हौंसले की जोत लेकर जब मुसाफ़िर चल दिया !
दौर गर्दिश के सभी फ़िर दूर से टलने लगे !!
 
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