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वर्ष: 2, अंक 24, नवम्बर(प्रथम), 2017



दोहा बन गए दीप


सुशील शर्मा


 
मरकट (17 गुरु 14  लघु)
राधा का दीपक जला कृष्ण सखा के नाम। 
ज्योतिर्मय गोकुल गली हर्षित राधा धाम।

धूम धाम से मन रहा दीवाली रसरंग। 
कील बताशे बंट रहे चारों ओर उमंग। 

शरभ (20 गुरु 8 लघु )
माँ की आँखों में सदा ,देखा है विश्वास। 
कर्मठता कर्तव्य की ,जीवन का उल्लास। 

नर (15 गुरु 18 लघु )
दीया माटी का कहे ,मुझ को रख तू संग। 
तमस निशा मुझ से डरे ,मन उजास के रंग। 

गोवर्धन गिरिराज हैं ,कृष्ण चंद्र के रूप। 
इंद्र अहम धूमिल किया रखा विराट स्वरूप। 

सर्प (48 लघु )
जलत जलत विरहन सहत मन तरसत पिय परम। 
मन बिसरत झुलसत ह्रदय विरह अगन सम गरम। 

चलबल (11 गुरु 26 लघु )
अमित अचल अविचल सदा ब्रह्म रूप गुण खान। 
मनमोहन के रूप का नारद शेष बखान। 

हंस (14 गुरु 20 लघु )
श्री वृन्दावन के मुकुट ,गोवर्धन भगवान। 
ब्रजमंडल के ह्रदय में बसते श्री श्रीमान। 

मंडूक (18 गुरु 12 लघु )
सिद्धि योग संग आज है  दीवाली का योग। 
लक्ष्मी जी हर्षित हुईं बना व्योम संयोग। 

करभ (16 गुरु 16 लघु )
धीरे धीरे प्रेम का ,होता है अहसास। 
प्रेम लगन जब भी लगे  जीवन बने उजास। 

भाई दूज के पर्व में ,बहन बलैयां लेय। 
जुग जुग वीरा तुम जियो ढेर दुआएं देय। 
 
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