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वर्ष: 2, अंक 24, नवम्बर(प्रथम), 2017



“मुहावरों भरी कविता”


डॉ०अनिल चड्डा


 
जो समझ से न चले, उसे अकल का अंधा1 कहते हैं,
जिनकी अकल घास चरे2, वो हरदम पीछे रहते हैं।

आग-बबूला होना3 नहीं, जरा-जरा सी बातों पर,
ऊँच-नीच समझने4 वाले, अकल ठिकाने5 रखते हैं।

बच्चो गाँठ बाँध कर6 रखना, मात-पिता जो कहते हैं,
निकल समय जब जाता है, तो हाथ ही मलते7रहते हैं।

कर्मवीर दुनिया में बनना, हटना पीछे नहीं कभी तुम,
पीठ दिखाने वाले8 बच्चो, चूड़ियाँ पहन9 के रहते हैं।

कान न भरना कभी किसी के 10, होती बहुत बुरी ये बात,
पाँव जो दो नाँवों में रखें11, न घर के न घाट के12 रहते हैं।


(1)मूर्ख,बेवकूफ (2)समय पर बुद्धि का काम न करना(3)गुस्सा होना (4)भलाई-बुराई, लाभ-हानि समझना (5)होश ठीक होना(6)याद रखना (7)पछताना (8)भाग जाना (9)कायर बनना (10)शिकायत करना (11)दोनो तरफ रहना (12)कहीं का न रहना
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