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वर्ष: 2, अंक 29, जनवरी(द्वितीय), 2018



मानवता का ह्रास...


डॉ नवीन दवे मनावत


   

मानवता का ह्रास हो रहा 
कलयुग का प्रभाव है...
आतंकवाद फैल रहा देखो
पग- पग पर संहार है...
भूल जाता है जब मानव
सीमाएं भी नहीं दिखती ...
ढेरों लाश बिछाने की 
लाज शर्म  भी नहीं दिखती !
ये क्रुरता कहां हुई पैदा?
मैं पुछ रहा अपने ह्रदय से,
जग को द्रवित करने की मर्मता बनी  प्रलय से।
प्रेम,सद्भावना,द़या निर्मल करो तन मन को ,
भद्रभावना का सुविकसित कमल 
खिलता रहे हर विश्व  जन मन को।।



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