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वर्ष: 2, अंक 28,  जनवरी(प्रथम), 2018



बरदाश्त


शशांक मिश्र भारती


रामलाल की इकलौती बिटिया गले में फन्दा डालकर झूल गई।

शायद कल रात का अपमान बरदाश्त न कर पायी थी। करती भी कैसे उसके ही बाप ने तो हैवानियत के नशे में उसे कमरे में बन्द कर लिया था।

रोना-गिड़-गिड़ाना कुछ काम न आया था।


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