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वर्ष: 2, अंक 28, जनवरी(प्रथम), 2018



हे शरद के चंद्र


सुशील शर्मा


    

हे शरद के चंद्र
तुम इतने शुभ्र शीतल

प्यार में पूरे पगे से
रात कुछ सोए जगे से
स्वप्नीले आसमान में
तुम इतने निर्मल
हे शरद के चंद्र
तुम इतने शुभ्र शीतल।

नील लोहित शाम
का है इशारा
उड़ती गोधूलि बेला
अद्भुत नजारा।
नील मणि सदृश्य
आकाश में तरल
हे शरद के चंद्र
तुम इतने धवल।

प्रिय प्रेम पाश में बंधी
अनवरत विकल
ये चांदनी क्यों बिछी
हीरक सी तरल।
ये नवयौवना सी सरिता
क्यों भागे उछल उछल
हे शरद के चंद्र
दिखते तुम नवल।

अधखुले झरोखे से
झांकती चन्द्रकिरण 
विह्वल मदमाती सी 
करती पिया का वरण 
मौन प्रिय प्रवास 
होता कितना विरल। 
हे शरद के चंद्र 
तुम इतने विव्हल। 

नीड़ में कुछ स्वप्न 
आशाओं से मढ़े हैं 
नवल कलियों के मुख 
अब खुल पड़े हैं। 
स्वच्छंद सुमंद गंध 
बहती अविरल 
हे शरद के चंद्र 
तुम क्यों इतने सरल।


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