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वर्ष: 2, अंक 28, जनवरी(प्रथम), 2018



ताकि जब मिलूँ तुमसे


सुजश कुमार शर्मा


    

भीड़ से बचा लाया हूँ
साफ़ कपड़े
ताकि धोने में तुम्हें तकलीफ़ न हो
नीड तक बचा आया हूँ
पाक नज़रें
ताकि जब मिलूँ तुमसे
तो तुम्हीं से मिल सकूँ।

शहर में फैली ग़र्द से
बचा लाया हूँ
स्वस्थ शरीर और रोग प्रतिरोधक क्षमता अपनी
ताकि शुद्धता और स्वस्थता में
हो सकूँ साथ तुम्हारे।

फिर लौटती ठंडी से बचा लाया हूँ
अपने चेहरे की रंगत वही
ताकि जब मिलूँ तुमसे
तो अजनबी-अजनबी-सा न लगूँ।

ट्रेन के घरघराते शोर में भी
बचाये रखा हूँ
दिलो-दिमाग़ की शांति
कि जब मिलूँ तुमसे
तो ठीक वैसे ही मुस्काते मिल सकूँ
जब हम पहली बार मिले थे,

ट्रेन की पटरी में दूर तक पसरे गिट्टी से भी
बचा लाया हूँ
सही सलामत पैर
ताकि मोच का दर्द ही दूर करते
न बीत जाए समय तमाम।

अजनबी यात्रियों की ऊटपटाँग बातों से
बचा लाया हूँ
अपने अभिव्यक्ति की शक्ति वही
ताकि कह सकूँ वही, उसी क्रम में,
जो कहना चाहता हूँ तुमसे।

उनके ही अजीबोगरीब गंध में
कम साँस लेते भी
बचा आया हूँ
अपनी घ्राण शक्ति
ताकि तुम्हारे होने की महक में हो सकूँ पूर्ण।

भीड़ में जाने-अनजाने
छूए जाने से बचाए रखा अपनी त्वचा
ताकि बनी रहे शुचिता, उस स्तर तक
जिस स्तर पर हो,
तुम्हारे साथ होने का आदी हूँ।

ट्रेन के लगातार बजते हार्न से
अब भी बचे हैं मेरे कान जीवित
सुनने, दो अक्षरों के बीच तुम्हारे साँसों का विस्तार।

इस तरह बनाये रखा हूँ
अपना उर्जा स्तर
कि जब जीयूँ
तो पूरी तरह जी सकूँ
साथ तुम्हारे।                      

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