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वर्ष: 2, अंक 28, जनवरी(प्रथम), 2018



क्षणांश-पुष्प


सुजश कुमार शर्मा


    
मैं हर बार कुछ क्षण बचा लूँगा।

चाहे कोई व्यवस्था
कितने भी विविध कार्य एक साथ देती रहे,
सब कुछ निष्ठापूर्वक, नियत समय में पूर्ण होगा
क्योंकि, दो क्षणों के बीच भी कुछ है
वह मैं बचा लूँगा।

सोच लूँगा
अपनी तरह से,
क्योंकि मैं तब भी हूँ
जब दो क्षण
प्रवाह में विसर्जित हो रहे, लड़ी बनाकर
ठीक अभी की तरह,
और ठीक उसी तरह
जिस तरह दो साँसों के ख़ाली स्थान में भी
मैं हूँ,
और यह, मैं बचा लेता हूँ,
हर बार, बार-बार।

देखता हूँ
ये शेष क्षणांश 
बड़ी बारीकी से तबदील हो रहे
एक अदृश्य पुष्प में
जिसमें महक है साँसों का अंतराल।

जानती हो तुम
यही पुष्प हर शाम
घर लौट
भेंट करता हूँ तुम्हें
अपनी मुस्कराहट की माला में पिरोकर।


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