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वर्ष: 2, अंक 28, जनवरी(प्रथम), 2018



वो हक़ मुझे लौटा दो


रश्मि सिंह


 

वो हक़ मुझे लौटा दो
वो मोहब्बत मेरी तुम लौटा दो
कि आज जी भर के तुझे चाह लूँ
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फिर  वो शाम आये न आये
आ आज तुझे जी भर के चाह लूँ
कि मेरी वफ़ा का तू इन्तहां न ले
कि आज जी भर के तुझे चाह लूँ
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मेरा प्रेम निश्चल सागर सा
आ आज तू सारे मोती थाम ले
पिरो ले एक माला तू मेरे प्रेम की 
कि आ आज जी भर के तुझे चाह लूँ
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जो अदृश्य माला पिरोई थी तुमने
मेरे प्रेम की ,तेरे प्रेम की
देखो उसकी मोतियों की चमक 
खत्म होती जा रही,सम्हाल लो
उस चमक को आज फिर से
और एक बार वही झूठ बोल दो
कि आ आज तुझे जी भर के चाह लूँ
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