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वर्ष: 2, अंक 28, जनवरी(प्रथम), 2018



मात्रभूमि व भाषा


कुलदीप पाण्डेय आजाद


 

चलता किस पथ पर जग सारा,
नए नियम क्या हैं इसके |
उग आए कंटक राहों पर,
चलते फिर भी क्यो इसपे |
नहीं समझता है कोई क्यों ,
अब इसकी  अभिलाषा को |
कोई ऐसा पथिक नहीं जो,
बदल सके परिभाषा को |
नई दिशा ये मांग रही है,
फैलाकर अपना आंचल |
विधि पर निर्भर प्रगति चाक में,
कहती कुछ लाओ हल-चल |
क्यों जीव सभी इस वसुधा के,
अब इतने अनुदार हुये |
कोई ऐसा हृदय नही क्या,
करुण वेदना जिसे छुए |
मातृभूमि व उसकी भाषा,
दोनों हमे पुकार रहीं |
है मांग रही इतिहास नया,
जिसमे हो अनुकार नही |
हमे पुकार रही कहती है,
ऋण मेरा कुछ कर दो कम |
तुझसे मिलकर मै तर जाऊँ,
तर जाये  तेरा जीवन |
कोई नही किसी पर निर्भर,
उस युग का निर्माण करे |
छोटों को प्यार मिले उनका,
बड़ों का सब सम्मान करे |
अपने जीवन मे मनुज सभी,
व्यस्त अगर हो जाएंगे |
हमसे कहें आप ही कैसे,
परिवर्तन हम लाएँगे |

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