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वर्ष: 2, अंक 28, जनवरी(प्रथम), 2018



आकांक्षा का भुतहा महल


कामिनी कामायनी


 
सीधी सरल रेखा पर/
चलती हुई जिंदगी /कब और कैसे /
अपनी राह भटक /होने लगी इतनी आक्रामक /
कि खुद से ही /लूट लिया /
खुद का चैन /शांति चित्त की/
भर लिए सपनों में दहकती चिंगारी /
उजाड़ दिया नेह के नीड़ को /
जला डाली सारे संस्कार /
पोथी पुराण /
रसों में मात्र वीभत्स एक /
साथ रहा उसके /
चलती थी जब उसके साथ /
चिंता वित्त की /
निर्मित होने को /होती  गई अट्टालिकाएँ/
सजते रहे ईट पत्थरों के ख्वाब /
इस भागम भाग मे /
गलता रहा शरीर /
परेशान होकर /
चाहा जब ममता का छाँव /
कोई वफादार न था /
दूर तक साथ देता /
ऐसा कोई सिपहसालार  न था /
बड़े ही डरावने /आकृतियो से भर गई थी /
आकांक्षा का वह /भुतहा महल /
घूँट रहा था दम/चाहा भागना /
खुले मैदान में /
भाग न पाया मगर /
सारे दरवाजे /सारी खिड़कियाँ/
गायब हो गईं /
चारों तरफ पत्थर के विशाल टुकड़े /
अब वह कभी बाहर झांक भी  नहीं सकता था/
जाने की बात तो दूर /
इस  जिंदगी में ।

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