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वर्ष: 2, अंक 28, जनवरी(प्रथम), 2018



घर चलाने की फिक्र में घुलते रहे


अर्विना गहलोत


 
ये कैसी जिन्दगानी है ।
नोंचती निगाहे  है ।
और बद जुबानी है।
हर लड़की की यही कहानी है।
कोन सी तहज़ीब में ।
तालीमें आफ़ता है।
ये क्या भाषा है ।
इनकी जुबान पर।
तख्त के लिए ।
और ताज के लिए।
क्या कर गुजरते है ये लोग।
इनके सीने में न दर्द है।
न कोई मुरव्वत है 
ये कैसी कुर्सी की कहानी है।
हर बार पुराने वादो की ।
तहरीर उठाकर ।
दरवाजे पर दस्तक दी है।
हम ही मुर्दा है जो ये बात न जानी है।
वादा खिलाफी इनकी रग-रग में बसी है।
फिर भी हमने अपने कीमती वोट
 से इनकी झोली भर दी ।
इनके मन की मुराद पूरी कर दी।
अब ये वफा करे न करे।
वाद खिलाफी तो इनकी निशानी है।
फिर एक बार इनको तो देश की ।
नईया इनको तो डुबानी है।
हम तो घर चलाने की फिक्र घुलते ।
ये कैसी जिन्दगानी है।

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