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वर्ष: 2, अंक 28, जनवरी(प्रथम), 2018



एक बार फिर जी लूँ


डॉ० अनिल चड्डा


 
एक बार फिर जी लूँ
वो गुजरे हुए क्षण,
यही चाहता है अतृप्त मन
वो गालियां पुरानी,
हवायें सुहानी,
तेरे संग खेलना,
वो राजा और रानी
कहाँ से में लाऊँ 
वो रातें नूरानी,
वो हाथों में हाथ
नटखट तेरा साथ
समझ में न आती थी
करें क्या हम बात
खुले गेसुओं में 
वो भीगी जवानी
हुई बीती वो बातें
नहीं कटती हैं रातें
अधखुली आंखों में
जब तुम हो आते
आंख बंद कर लूँ
तुम्हे कैद कर लूँ
जो तुम यूं न आओ,
तो सपनों में आओ,
गया वक्त फिर मैं
सपनों में जी लूँ

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