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वर्ष: 2, अंक 28, जनवरी(प्रथम), 2018



कोहरा


अमरेश सिंह भदोरिया


       
कोहरा       बहुत      घना    है।
कोहरा       बहुत      घना    है।
	1. 
दूर    हुयी    सूरज   से    लाली,
रश्मियों   ने   ख़ामोशी     पाली, 
सर्द    हुयी   मौसम     की  राते,
घोसलें    में    पंछी       घबराते,
जाड़े    की   ऋतुओं   में    दिन,
रातों    का    पर्याय      बना है।
कोहरा        बहुत      घना    है।
कोहरा        बहुत      घना    है।
	2.
कुहासे में  छिप   गयीं  बस्तियां,
काँपती  ठिठुरन    में  अस्थियां,
सिकुड़न आयी      अंतड़ियों में,
अलाव  जलते     झोपड़ियों  में, 
झंझानिल आघात     सहने  को,
परदा       द्वार      तना         है। 
कोहरा        बहुत       घना   है।
कोहरा        बहुत       घना   है।
	3.
जीविका    की  टूटी     आशाएं,
ढकी  धुंध  में    सभी    दिशाएं,
भूँख   से   बच्चे ब्याकुल   होते,
रोटी के    सवाल    पर      रोते,
अभाव के  संग जीवन    जीना,
समाज में अभिशाप     बना है।
कोहरा        बहुत      घना   है।
कोहरा        बहुत      घना   है।
	4. 
खांई ज्यों-ज्यों      बढ़ती  जाती,
चौड़ाई  भी   रूप          बढ़ाती,
निर्बल सांसो का क़हर  जो टूटा,
समझो   ज्वालामुखी है     फूटा,
जब-जब  भड़की  है  चिनगारी।
रूप    उसका   अंगार   बना है।
कोहरा       बहुत       घना    है।
कोहरा       बहुत       घना    है।

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