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वर्ष: 2, अंक 28, जनवरी(प्रथम), 2018



तू जब भी मिल के जाती है


अभिषेक सिंह "अंकुर"


 
तू जब भी मिल के जाती है ,
जिन्दगी कुछ दिन थम सी जाती है ।

तेरी सूरत नज़र से हटती ही नहीं ,
ख़्वाब में रोज तू आ जाती है ।

पास न हो के भी तू मेरे हमदम ,
जानें क्यों मुझको यूँ सताती है ।

तुझसे दूर जाने के एहसास भर से ,
मेरी तो  जान  निकल जाती है ।

एक उम्मीद है जो दिल ने जगा रखा है ,
एक डर है तुझे मेरी याद नहीं आती है ।

तू दिल से  निकलकर कभी जाती ही नहीं ,
कोशिशें लाख करूँ तेरी याद आ ही जाती है ।
  

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