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वर्ष: 2, अंक 28,  जनवरी(प्रथम), 2018



स्वयंवर


राम प्रकाश सक्सेना


जब मैं बी. ए. में पढ़ती थी, उस समय भटनागर नाम के टीचर थे, जिन्होंने अपने विचारों से मुझे क्रांतिकारी बना दिया| उनका कहना था कि मनुष्य के जीवन में चार बड़ी घटनाएँ होती हैं:- जन्म, मृत्यु, विवाह, ओर व्यवसाय| जन्म ओर मृत्यु पर हमारा कोई अधिकार नहीं है, लेकिन अपना विवाह ओर प्रोफ़ेशन अपनी इच्छा से चुनना चाहिए|

मैंने इसको अपने जीवन का मूल मंत्र बना लिया| मेरा पिता मुझे ऐडवोकेट बनाना चाहते थे ओर माँ मुझे डॉक्टर| मैं होटल मैनेजमेंट में जाना चाहती थी| मुझपर काफ़ी दबाब डाले गए| इमोशनली ब्लैकमेल भी किया गया, लेकिन मैं टस से मस नहीं हुई| मैनेजमेंट कोर्स करने बाद मुझे एक होटल में नौकरी मिल गई| सैलरी अच्छी मिलती थी, इसलिए माँ-बाप भी खुश थे|

जब मेरी उम्र 24 साल हुई तो माँ बार-बार विवाह की बात करने लगी| उनका विचार था, कि लड़की का विवाह हर हालत में 25 साल से पहले हो जाना चाहिए| पिता का कहना था कि अपनी लड़की सुंदर है, सुशील है, और काफ़ी तनख्वाह है, इससे कोई भी लड़का शादी करने को तैयार हो जाएगा| मैं बार-बार पिता से पूछती, “पापा, क्या स्वयंबर में विश्वास करते हैं?”

माँ तो खामोश रहती पर पिता बड़े उत्साह से कहते “क्यों नहीं, स्वयंबर तो हमारे भारतीय संस्कृति का भाग है| तुम पड़ी-लिखी हो, होशयार हो, तुम्हें आज़ादी है कि तुम योग्य वर ढूँढो|”

होटल में मेरे कई साथी थे, जिनसे मेरी अच्छी दोस्ती हो गई थी| हमलोग घंटों उनसे बात करते| एक दिन एक बॉय फ्रेंड ने मुझसे शादी का प्रस्ताव रखा| मैंने भी कह दिया, मेरे माता-पिता स्वतंत्र विचार हैं| इस संडे को घर आ जाइए, मैं उनसे मिलवा दूँगी|”

नियत समय पर मेरा बॉय फ्रेंड मेरे माँ-बाप से मिलने मेरे घर आया| मैंने अपने माता-पिता से उसका परिचय कराया

’यह है अशरफ़, मेरा बेस्ट फ्रेंड ।’ अशरफ़ का नाम सुनते ही माँ ने उस से पूछा, ’क्या आप मुसलमान हैं?’

उसने बड़ी सादगी से उत्तर दिया, ’हाँ, मैं मुसलमान हूँ।’ पिता ने पूछा, ’क्या आपके माँ-बाप एक काफ़िर की लड़की से शादी करना पसंद करेंगे?’

अशरफ़ ने बड़े सौम्यता से कहा, ’ क्यों नहीं करेंगे। शादी मेरी होगी, इसमें माँ-बाप क्यों दख़ल-अंदाज़ी करेंगे।’

औपचारिकतावश अशरफ़ को अच्छा नाश्ता कराकर विदा कर दिया गया। उसके जाते ही घर में हाय-तौबा मच गया ।

माँ ने कहा, ’इतनी बड़ी दुनिया में तुम्हें सिर्फ़ मुसलमान ही मिला। अपनी जाति का कोई लड़का नहीं मिला?’

पिता ने उसमें जोड़ा, ’तुम अपनी मर्जी से शादी करो अच्छी बात है। लेकिन तुम विधर्मी चुनोगी यह मैं सोच भी नहीं सकता। शायद तुमने गंभीरता से इस बात पर विचार नहीं किया कि दूसरे धर्म से शादी करने में क्या-क्या समस्याएँ आती हैं।’

मैं चुप रही और इस बात पर अपने परिवार से बात करना उचित न समझा । दूसरे दिन ऑफ़िस में अशरफ़ मिला, जो विवाह के बारे में मेरे माँ-बाप की प्रतिक्रिया जानने के लिए व्याकुल था।

मैंने टालते हुए उत्तर दिया, “अभी विचार-विमर्श चल रहा है|”

कुछ दिनों बाद मैंने अशरफ़ से कहा, ‘क्यों न तुम भी अपने माँ-बाप से विवाह के बारे में सलाह-मशवरा कर लो।’

उसने उत्तर दिया, “वे तैयार नहीं है|”

उसका उत्तर सुन मेरा माथा ठनक गया। आहत स्वर में मैंने कहा , “हम लोग कोर्ट मैरिज नहीं कर सकते?”

“मैं उनका इकलौता बेटा हूँ। उनकी मर्ज़ी के बिना शादी नहीं कर सकता।“

“मुझसे प्यार करने से पहले तुमने अपने माँ-बाप से इजाज़त क्यों नहीं ली थी। क्या प्यार के वादे तुमने उनसे पूछ कर किए थे|”

मेरी नाराज़गी हद से आगे बढ़ गई थी।

“मैरिज न सही, हम लोग अच्छे दोस्त बनकर तो रह ही सकते हैं।“अशरफ़ ने बात सँभालने की कोशिश की।

“शायद तुम दोस्ती और प्यार में अंतर करना नहीं जानते। हम दोस्ती की सारी सीमाएँ पार कर चुके हैं यानी बिन ब्याह पति-पत्नी के रिश्तों में जीने लगे हैं हम दोनों|”

अशरफ़ ख़ामोश रहकर वहाँ से उठ लिया। काफ़ी दिनों तक उससे बात नहीं हुई। मैंने वह नौकरी छोड़कर दूसरी जगह काम करना शुरू कर दिया। मेरे लिए कई अच्छे लड़के देखे गए, उन्हें मुझे दिखाया गया। देखने-दिखाने की रस्म से ऊबकर मैंने साफ़ लफ़्ज़ों में माँ से कह दिया, “शादी करूँगी तो अपनी इच्छा से, किसी की दखल अंदाजी पसंद नहीं। यही मेरे गुरु ने सिखाया है|”

साल बीतते-बीतते मेरी दोस्ती एक अन्य लड़के से हो गई। एक दिन मैं उसे घर ले आई माँ-पिताजी से मिलाने। जैसे ही मैंने उसका परिचय कराया, “ये हैं कमल किशोर|”

माँ ने फिर वही चिर-परिचित प्रश्न किया, “बेटा, आपकी जाति क्या है?”

“मैं शिड्यूल कास्ट का हूँ|” उसने शांत एवं मधुर आवाज़ में उत्तर दिया।

नाश्ते की औपचारिकता के बाद वह चला गया।

अब माता-पिता का कहना था, “क्या और कास्ट में लड़के नहीं रहे? तुम्हे केवल शेड्यूल कास्ट ही मिला|”

कुछ दिनों बाद मुझे वही भटनागर टीचर मिले। मैंने अपनी समस्या उनको बताई। वे चुप रहे।

मैंने ही प्रश्न किया, “जब हज़ारों साल पहले हमारे धर्म में स्वयंवर को मान्यता दी थी, अब क्यों नहीं? समाज समय के साथ और प्रगतिशील होना चाहिए|”

सर थोड़ी देर फिर ख़ामोश रहे, जैसे उत्तर ढूँढ रहे हों।

मैंने ही उन्हें झकझोरा, “सर आप बोलते क्यों नहीं|”

“हज़ारों साल से हमें गलत ढंग से पढ़ाया गया, जिससे हमारा दिमाग इतना कुंद हो गया कि हममें सही ढंग से सोचने समझने की शक्ति ही नहीं रही। प्राचीन काल में स्वयंवर नाम तो दिया गया पर कभी स्वयंवर हुआ ही नहीं।’

“सर, क्या सीता का उदाहरण नहीं है?”

“नहीं, बिल्कुल नहीं। सीता का क्या द्रौपदी का भी नहीं हुआ। सीता के स्वयंवर में उनके पिता जनक की यह सनक थी कि जो धनुष तोड़ेगा वह सीता को ले जाएगा। इसमें सीता की इच्छा कहाँ दिखाई देती है।“

एक गहरी साँस लेकर वे फिर बोले, ’हज़ारों साल से यही होता चला आ रहा है, उसी विचार धारा को आगे बढ़ाते हुए आजकल के माँ-बाप भी बस यही कहते हैं, हमारे लिए शादी में तुम्हारी इच्छा ही हमारे लिए सर्वोपर है लेकिन स्वयंवर में कुछ न कुछ निकाल कर और इमोशनली ब्लैकमेल करके अपनी इच्छा को लाद देते हैं| पुरुष प्रधान समाज में तुम स्वयंवर की आशा लगाए क्यों बैठी हो? अपना निर्णय खुद लेने का साहस जुटाओ|”


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