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वर्ष: 2, अंक 28, जनवरी(प्रथम), 2018



डर है


यूसुफ़ रईस


 

किसी जादू किसी टोने का डर है
कहीं कुछ तो बुरा होने का डर है।

पहन कर भी हंसी के नकली ज़ेवर
उदासी के बयां होने का डर है।

उसी की  जुस्तजू में रात-दिन हूँ 
जिसे हर हाल में खोने का डर है।

दरकती जा रही है नींव घर की
ख़ुदा! बरसात भी होने का डर है।

हमें आपस में जो बांधे है अब तक
उसी अहसास के खोने का डर है।

बयां कर दूँ उदासी का सबब भी
मुझे  बस  आपके रोने का डर है।

कई  चेहरों से  है  पहचान मेरी 
जिन्हें अब भीड़ में खोने का डर है ।

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