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वर्ष: 2, अंक 28, जनवरी(प्रथम), 2018



मैं तो मिट्टी हूँ


रोहिताश्व मिश्रा


 
वक़्त आने पे किधर से भी निकल जाऊँगा,
मैं तो मिट्टी  हूँ हर  इक शेप में ढल जाऊँगा।

आबजू  तू  ये बता  रूठ  के जाएगा किधर,
मैं  तो दरिया  हूँ नई  रह पे निकल जाऊँगा।

ऐ दरख़्त अपनी अना को तू बचा के ही रख,
मैं  तो  पौधा हूँ  गिरूँगा तो संभल जाऊँगा।

मुझ  को चलने  दे मेरे  देस की ही मिट्टी पर,
संग-ए-मर्मर  पे चलूँगा तो फिसल जाऊँगा।

में तो  पर्वानः हूँ  गर जिस्म  मुझे  और मिले,
शम्अ के इश्क़ में सौ बार भी जल जाऊँगा।

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