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वर्ष: 2, अंक 28, जनवरी(प्रथम), 2018



किस लिये गिला हो


डॉ. रंजना वर्मा


 
 
 
पायी नहीं वफ़ा ग़र तो किसलिये गिला हो ।
कोई  नहीं  जरूरी  हर  शख़्स  बावफ़ा हो ।।

यों तो हुआ ही करते हैं  हादसे हमेशा
पर साथ अब हमारे कोई न हादसा हो ।।

रहने को  हो  महल  ही  ये कब हुआ  जरूरी
लेकिन सिरों पे सबके छत का तो आसरा हो ।।

रातें  रहें  अँधेरी  तब  भी  न  बात कोई
पर रास्ता दिखाने को दीप तो जला हो ।।

चुपचाप हैं कटाते सरहद पे जो सिरों को
इतिहास में कहीं पर पर वो नाम तो लिखा हो ।।

अश्कों से भीगता है सिरहाने रखा तकिया 
अब और क्या बतायें तोहफ़े में जो मिला हो ।।

राहों  में  जिंदगी  की   चलना  पड़ा  अकेले
चाहत न हुई दिल मे कोई साथ काफिला हो ।।


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