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वर्ष: 2, अंक 28, जनवरी(प्रथम), 2018



ज़माने गुज़र गए


नवीन मणि त्रिपाठी


 
यूँ  तीरगी   के  साथ  ज़माने   गुज़र   गए ।
वादे   तमाम   करके  उजाले  मुकर  गए ।।

शायद अलग था हुस्न किसी कोहिनूर का ।
जन्नत  की  चाहतों  में  हजारों  नफ़र गए ।।

ख़त पढ़ के आपका वो जलाता नहीं कभी ।
कुछ तो  पुराने ज़ख़्म थे पढ़कर उभर गए।।

उसने  मेरे  जमीर  को  आदाब क्या किया ।
सारे   तमाशबीन   के   चेहरे   उतर   गए ।।

क्या देखता मैं  और  गुलों  की  बहार  को ।
पहली  नज़र में आप  ही दिल मे ठहर गए ।।

अरमान भी मिरे थे  कि  पहुंचेंगे  चाँद तक ।
इस  बेरुखी  के  दौर में  सपने  बिखर गए ।।

कुछ  खैर ख्वाह भी थे पुराने शजर के पास ।
आयीं  जो आँधियाँ तो वो जाने किधर गए ।।

तकदीर   हौसलों   से  बनाने  चला  था  वो ।
आखिर  गयी  हयात  सितारे  जिधर   गए ।।
        

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