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वर्ष: 2, अंक 28, जनवरी(प्रथम), 2018



मौत का पैगाम


डाॅ. कौशल किशोर श्रीवास्तव


 
बदन पर मौत का पैगाम हूं मैं 
कफन हूं झबले का अंजाम हूं मैं

बीच में दोपहर पसरी पड़ी है 
सुबह से बिछड़ी हुई शाम हूं मैं

जमाना दूरी रख कर बैठता है 
अपने ईमान को बदनाम हूं मैं 

अभी कई मील की दूरी पड़ी है 
होंठ तक जाता हुआ जाम हूं मैं 

सदा कल पर मुझे तुम छोड़ते हो 
कभी ना खत्म हो वह काम हूं मैं

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