Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 2, अंक 28, जनवरी(प्रथम), 2018



दीप बनकर...


अमरेश सिंह भदोरिया


 
दीप बनकर     रात   के 
साये में  जलना   चाहता हूँ। 
मैं  भी    समय   के    साथ-
साथ    चलना    चाहता  हूँ।
	1.
राह  में   गिरना   फिसलना 
बात  बीते   कल  की    थी;
आज   अपने    पैरों     पर
मैं भी  सम्भलना चाहता हूँ।
	2.
छाया   हो    या    धूप    हो 
या कि  हों  बरखा के   दिन;
बादलों    की    बूँद-सा    मैं 
जमी पर बरसना चाहता हूँ।
	3.
हर   तरफ   होती   है   चर्चा 
बस  सियासी  तल्खियों की;
काजल  की  इस  कोठरी से
मैं बाहर निकलना चाहता हूँ।
	4.
बढ़   गई   ना   जाने     कैसे 
अपने    दिलों     में    दूरियां;
भूल कर    शिकवे   गिले  मैं
अब  गले  मिलना  चाहता हूँ।

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें

www.000webhost.com