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वर्ष: 2, अंक 28, जनवरी(प्रथम), 2018



चंदामामा,चंदामामा


राजेश"ललित"शर्मा


 
चंदामामा,चंदामामा
उठो,अब शाम ढल आई
छोड़ो आलस्य
लपेटो अधखिली धूप की चादर
समेटो तारों भरा थाल
चलो थोड़ा चमको
नहाये नहीं अभी चाँदनी से
धुँधला गये हो
पराली के धुंये से
बच्चे भी नहीं पहचानते
बादलों की ओट लेके
मुँह छिपाते मामा
अँगूठा चूसते बच्चे/पूछते
मामा का पता
कहाँ ले जाये माँ ?
चौथी मंज़िल पर रहती
दसवीं मंज़िल पापा ले जायेंगे 
छुट्टी के दिन
देखना चंदामामा जीभरके
धुँध न हुई तो??????

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