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वर्ष: 2, अंक 27, दिसम्बर(द्वितीय), 2017



अनासक्ति


मोती प्रसाद साहू


उस अदृश्य नियन्ता ने
पर्वत कहीं समुद्र बनाया।
कहीं सम मैदान बनाकर
उस पर जन आबाद कराया।।

पर्वत ने पाया है नभ को
सागर ने पायी गहराई।
मानसून का चक्र चलाकर
उसने है विज्ञान सिखायी।।

पर्वत को मिलता जो जल है
सागर को लौटाता नदियों से।
पर्वत दिखलाता अनासक्ति
सागर वापस करता नीरद से।।


यह चक्र संतुलन अनायास
आपस का प्रेम सिखाता है।
अनासक्त संग्रह करने का
सात्विक भाव जगाता है।।

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