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वर्ष: 2, अंक 27, दिसम्बर(द्वितीय), 2017



पीड़ा को नित सन्दर्भ
नए मिलते हैँ


अमरेश सिंह भदोरिया


 
वक़्त के थपेडों से 
घाव जब सिलते हैं।
पीड़ा को नित 
सन्दर्भ नए मिलते हैं ।

	1.
वेदना सघन लिये
नस्तर सी चुभन लिये
सियासी यकीन पर
सुलगती ज़मीन पर
रिश्तों के दर्प सभी
मोम से पिघलते हैं।
पीड़ा को नित 
सन्दर्भ नए मिलते हैं ।

	2.
बिखरे अतीत-सी
पार्थ की जीत-सी
भाग्य की हीनता में
सुदामा-सी दीनता में
मुफलिसी के ख्वाब
कहाँ महलों से संभलते हैं।
पीड़ा को नित 
सन्दर्भ नए मिलते हैं ।

	3.
दीपदान कहानी से
पन्ना की कुर्बानी से
धर्म की दुकान के
रेशमी ईमान के
हवन करते हुये भी
हाथ जहाँ जलते हैं।
पीड़ा को नित 
सन्दर्भ नए मिलते हैं ।

	4.
भोर के गीत-सी 
विरहिणी के मीत-सी
परियों की कथा में
अन्तर की व्यथा में
करुण रुदन से "अमरेश"
अश्रु जब निकलते हैं
पीड़ा को नित 
सन्दर्भ नए मिलते हैं ।

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