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वर्ष: 2, अंक 26, दिसम्बर(प्रथम), 2017



हादसे दर हादसे


डाॅ. कौशल किशोर श्रीवास्तव


पत्नि के भयानक भाइयों को साले कहा जाता है। जो नफरत और प्रेम का रिश्ता पत्नि से होता है वही जीजा का सालों से रहता है। फर्क बस इतना रहता है कि पत्नि स्त्रीलिंग और साले लठैत लिंग होते हैं।

मेरी पत्नि ने मुझे ठेलते हुये कहा कि तुम्हारे प्यारे साले तुम्हें याद कर रहे हैं।

मैनंें जवाब दिया ‘‘इसी लिये मुझे उबकाई आ रही है।’’

पत्नि ने उप सामान्य ज्ञान बघारते (या छोंका लगाते हुये) हुये कहा कि ‘‘जब आपका प्यारा जैसे कि मैं याद करती हूँ तब हिचकियाँ आतीं है उबकाई तो औरतों को तब आती है जब खुशी का कोई समाचार मिलने को होता है।

फिल्मांे ने हमारा सामान्य ज्ञान विकृत कर दिया है। मैनें जवाब दिया ‘‘सही है पर आदमियों को तब उबकाई आती है जब उन्हें कोई डरावना आदमी याद करता है। मैं मेरी ससुराल नहीं जाऊंगा। तुम्हारे भाई लोग लठैत है। तुमने देखा नहीं कि मैं ससुराल से लौटते वक्त कई बार प्लास्टर बंधवा कर आया हूँ।

पत्नि ने प्रतिरोध किया क्यों मेरे भाइयों को बदनाम करते हो केवल दो बार ही तो प्लास्टर बंधवा कर आये हो। एक बार तो तुम्हारी ही गलती थी। ‘‘जब मंझले ने तुम्हें लात मारी थी तब तुम ही गिर पडे थे। अब उन्हें क्या मालूम था कि तुम इतने लिस्सड़ हो।’’

मैं ने कहा ‘‘ तुम्हें तुम्हारे पिता जी की तेरहवी दिन की याद नहीं है जब तुम्हारे बड़े भाई ने तुम्हारे मंझले भाई को ललकारते हुये कहा था कि ‘‘मंझले खाना बाद में खायेंगे। तू तेरा लट्ठ उठा और मैं मेरा उठाता हूँ। देखूं, तो तुझमें वही दमखम है कि नहीं जो शोले में जय और वीरू मंे था।’’ फिर वे दोनों मेहमानों को ललकारते हुये कह गये थे ‘‘खबरदार जो किसी ने हमारे लौटने के पहले खाना खाया या कोई भागा। हमें मालूम है कि कौन साला कौन सी पत्तल पर बैठा है।’’

‘‘मगर उनमें प्रेम भी तो बहुत है। तुमने देखा नहीं था कि वे दोनों कितने प्रसन्नचित्त वापिस आये थे भले ही दोनों के सिर फूट गये थे।’’ पत्नि ने कहा।

मैंने कहा ‘‘ हां मुझे याद है कि हम डरते हुये वापिस उसी दिन लौट आये थे।’’

पत्नि ने प्रतिवाद किया‘‘ तुम्हीं डर रहे थे। मैं तो दोनो का प्रेम देखकर खुश थी।’’

मैंने कहा ‘‘ तो तुम्हीं चली जाओं मैं तुम्हारा ट्रेन से आरक्षण करवा देता हूँ।’’

पत्नि बोली ‘‘ मुझे जरूरी काम न होता तो मैं चली जाती। मुझे मिसेज शुक्ला से एक झगड़े का निपटारा करना है।’’

मैंने कहा ‘‘ तो तुम्हीं बाद में चली जाना। लड़कियों को तो मायके जाने में खुशी होनी चाहिये।’’

पत्नि ने कहा ‘‘ हाँ होती है पर मुझे उनके झगड़े से डर नहीं लगता उनके प्रेम से लगता है।’’

मैंने फिर भी प्रतिवाद किया ‘‘मैं नहीं जाऊँगा उन लठैतों के बीच।’’

पत्नि बोली ‘‘अब वे सुधर गये हैं वे अब लट्ठमारी नहीं करते केवल हाथा-पाई करते हैं जैसी कि मैं तुम्हारे साथ करती हूँ।’’

चूंकि तवा गर्म होने को ही था। अतः मैंने बुझे मन से कहा अच्छा मैं चला जाता हूँ पर तुम मेरी आरती उतार दो।’’

पत्नि ने जवाब दिया ‘‘ अब चले भी जाओ कुछ ऐसा वैसा नहीं होगा।’’

मैंने कहा ‘‘ मैं तुम्हारे भाइयों के थप्पड़ों से नहीं डरता। मैं तो ट्रेन एक्सीडेंट से डरता हूँ। देख नहीं रही है आज यानि दिनांक 29/08/2017 तक पिछले दस दिनों में तीन ट्रेेन एक्सीडेंट हो गये हैं।’’

पत्नि ने कहा ‘‘अरे हां, मैं भूल गई थी कि तुम्हें मेरे भाइयों के अलावा भी खतरा हो सकता है।’’ फिर कुछ देर चुप रह कर उसका चेहरा गुस्से से लाल हो गया, नथुने फड़कने लगे और गुस्से में जो भी शारीरिक भाशा में परिवर्तन हो सकते थे होने लगे। वह तमतमा कर बोली ‘‘अच्छा इसीलिये तुम मेरा आरक्षण करवा रहे थे कि मुझे टेªेन में बिठाने के बाद मेरा मारक यज्ञ करवा सको।’’

मैं जल्दी में कह गया ‘‘सहीं पकड़े हो।’’ फिर जल्दी से बोला तुम जल्दी से आरती उतारो, नही ंतो मैं रूक जाऊंगा।

पत्नी जल्दी से आरती सजा कर ले आई पर उल्टी आरती उतारने लगी। मैंने आतंक में आकर पूछा ‘‘क्यों मेरी उल्टी आरती उतार रही हो?’’

उसने जवाब दिया ‘‘मैं उल्टी आरती नहीं उतार रही हूँ बल्कि तुम्हारी वे बलायें उतार रही हूँ जो रास्ते में आने वाली हैं क्योंकि वहां तुम्हारी झकर तो मेरे भाई ही उतार देंगे।

खैर बड़े बे-मन से मैं ट्रेन में बैठा। मैं मुड़-मुड़ कर अपने शहर को देखता जा रहा था कि मालूम नहीं मैं तीर्थ यात्रा से वापिस भी लौट सकूंगा या नहीं। कुछ जंकशन सकुशल निकल गये। वहां उतरने वाले यात्री ट्रेन के पैर पड़कर उतरने लगे। और जो डब्बों के अंदर थे, वे उतरने वालों को बधाइयां देने लगे। हर जंक्षन पर सब यात्री भगवान को धन्यवाद देते जा रहे थे। फिर एक जंक्षन गुजरने के बाद बीच जंगल में क्या हुआ कि खड़-खड़ की आवाज आने लगी फिर कुछ मीटर चल कर ट्रेन एक तेज झटके के साथ ऐसी रूकी कि ऊपर के यात्री नीचे गिर गये और नीचे के यात्री उछल कर ऊपर की बर्थ पर जा गिरे। हम जिन्दा लोगों ने अंदाज लगाया कि ट्रेन का (रेलगाड़ियां जब चलती थी तब दुर्घटनायें नहीं होती थीं) एक्सीडेंट हो गया है। ‘एक्सीडेंट’ शब्द का उपयोग इसलिये किया गया है कि दुर्घटना में वह भयानक प्रतिध्वनित नहीं होती जो कि एक्सीडेंट में होती है।

जो बच गये थे वे नीचे उतरे। देखा कि हमारी टेªेन सामने की ट्रेन से टकरा गई थी। दोनों ट्रेनों के आगे के तीन डब्बे इतने चकनाचूर हो गये थे कि मरे हुये व्यक्तियों के पोस्टमार्टम की भी जरूरत नहीं रही थी। जो मृतक थे उनमें से हरेक के पाँच-पाँच रिष्तेदार जानें कहां से एकदम अवतरित हो गये थे। बाकी सब यात्रियों मंें स्वयं को घायलों की पंजी में लिखवाने की होड़ मच गई। कुछ पास के शहर वाले भी आकर टेबिल के नीचे से घायलों में नाम लिखाने लगे जैसा कि भोपाल गैस काण्ड मंें हुआ था। भोपाल गैस काण्ड में कुछ लोग आस्ट्रेलिया में थे पर भोपाल गैस काण्ड से पीड़ित हो गये थे। भारत में चमत्कार होते रहते हैं। जो पी.एम.टी. में ‘‘फेल’’ हो जाते हैं उनका एडमीशन मेडिकल कालेज में हो जाता है और जिनको पास होने की आशा होती है वे निराश होकर अगले साल फिर पेपर्स अच्छा होने के बावजूद फेल होने की तैयारी करने लगते हैं। आज कल तो ‘मेड इन चाइना’ डाक्टर आने लगे हैं जो पी.एम.टी. को लात मार कर सरकारी नौकरी पा जाते हैं। भविष्य अब उन्हीं डाक्टरों का उज्जवल है जो गोरखपुर काण्डों को अंजाम देकर भारत की वर्तमान सख्या को कानूनी रूप से कम कर सकें।

मैं भीड़ का हिस्सा ही था जैसे कि हर आदमी होता है। कृतिम सहायता के नाम पर पास के शहर वाले मृतकांे के जेब, कलाई (घड़ियों के लिये), महिलाओं की कलाईयों और गरदन की तलाशी ले रहे थे। सहायता करने वालोें की होड़ लगी हुई थी। फिर पुलिस आ गई और सहायता करने वालों को डन्डे मार कर उनकी तलाशी लेने लगी। उनके सद्कार्य के बाद सचमुच के सहायता करने वाले आये जो स्वयं का आटा एवं घी खर्च करके सब्जी-पूडी बना कर जठराग्नि रूपी अग्नि में स्वाहा करने लगे।

इसके बाद एम्बुलेंसें और फायर बिग्रेडें आ गईं । साथ में उच्चाधिकारी लोग आ गये। अब अपराध वैसे ही रूक गये जैसे कीटनाशक दवाईयों के छिड़काव से फसल के कीड़े मर जाते हैं।

अब सचमुच के घायलों को अस्पताल पहुंचाया जाने लगा।

मैंने सड़क छाप ज्ञान बगराया ‘‘जो डब्बे चकनाचूर हो गये हैं उन्हें छोड़कर बाकी डब्बों को तो अपने गंतव्य पर ले जाओ।’’

सबने जलती नजरों से मुझे देखा । फिर मेरा नाम भी दिमागी घायलों में लिख कर भरती करवा लिया गया एक शायर भीड़ देख कर गजल सुनाने लगे , उन्हें घायलों से निम्न प्रेरणा मिली:

घायलों के हुक्म नामे, कब्र तक जाने लगे।
अफसरों के झुंड, लाशों को धमकाने लगे।
सफर के आगाज पर थीं तितलियां मैदान में।
मील कुछ आगे चले तो गिद्ध मंडराने लगे।

बचे कुछ लोगों ने उनकी पिटाई लगा दी तो वे सचमुच के शायर बन गये। भीड़ नेताओं को प्रेरणा देने लगी। एक टोपीधारी कागज की पुंगी बनाकर एक टूटे रेल के डब्बे पर खडे होकर भाषण देने लगेः

इस रेल दुर्घटना में विरोधी पार्टी की सरकार का हाथ है जिसने साठ साल देश पर राज्य किया । उन्होने आई.एस.आई से मिलकर इस षड़यंत्र को अंजाम दिया है।

एक अफसर ने कहा साहब आप लाशों पर खड़े होकर भाषण दे रहे हैं । आप हटें तो डब्बा तोड़ कर लाशों और बचे घायलों को निकाला जाये। उन्हें अपनी ही पार्टी के अफसरों का कहना मानना पड़ा।

यहां पूरी लाशों को निकाल भी नहीं पाये कि एक्सीडेंट के दो मिनिट बाद ही मंत्रालय का वक्तव्य आ गयाः दोषियों को बख्षा नहीं जायेगा। हमनें मजिस्ट्रियिल जांच के आदेश दे दिये हैं और रेलमंत्री को हटा कर उसे उद्योग मंत्री बना दिया है। ‘‘ऐसा लगता है कि सरकार के पास हर दुर्घटना के लिये ऐसे स्टेटमेन्टों का प्रसारण विभाग अलग ही है जो त्वरित स्टेटमेंट दे देता है। सरकार रेल मंत्री बदल देती है खराब पटरियां नहीं बदलती। जर्जर कच्ची नींव पर अ्ट्टालिकायें बनाती जाती है।

मुझे भी जबरन अस्पताल ले जाया गया। वहां सरकार के पास इतने बिस्तरों का इंतजाम नहीं था जितने की घायल थे। अतः सड़कों पर घायलों को बोतल लगाई जाने लगी। जब तक उच्चाधिकारी रहे तब तक डाक्टर मुस्तैदी दिखाते रहे, जब उच्चाधिकारी मंत्री की सेवा में लग गये तो डाक्टर निजी अस्पतालों में चले गये।

उनके जाने के बाद वार्डब्वाय घायलों से इनाम मांगने लगे। एक घायल ने कहा ‘‘एक्सीडेंट के पहले मेरी जेब में छब्बीस हजार रूपये थे, मेरा खराब समय आया तो लक्ष्मी मेरा साथ छोड़कर चली गयी। तुम्हारा एकांउट नंबर दे दो। मैं अच्छा होकर तुम्हारे एकांउट में पैसे जमा करवा दूँगा।

फलतः एक्सरे के लिये उसे स्ट्रेचर पर पहले ले जाया जाने लगा। वैसे भी मुझे लगा कि अस्पताल में स्ट्रेचर बहुत कम थे, जो थे उनमें भी रस्सियों से रिपेयरिंग की गई थी।

ऐसे ही एक स्ट्रेचर पर उस अमीर आदमी को एक्स रे के लिये ले जाया जाने लगा। दुर्भाग्यवश वह स्ट्रेचर बीच में से टूट गया। वह अमीर आदमी सिर के बल नीचे गिर गया और सिर की चोट की वजह से उस आदमी की मौत हो गई। जिसे भगवान ने बचाया उसे अस्पताल ने मार दिया।

उधर घटनास्थल पर टेलीविजन के पत्रकार घायलों से पूछ रहे थे ‘‘ तो तुम्हें घायल होकर कैसा लग रहा है।’’

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