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वर्ष: 2, अंक 26, दिसम्बर(प्रथम), 2017



वैश्विक स्तर पर हिन्दी


डॉ. रानू मुखर्जी


आज भारत आधुनिकीकरण की प्रक्रिया व प्रभाव से गुजर रहा है और इस प्रक्रिया में हिन्दी को भी साथ में चलना होगा। नए ज्ञान – विज्ञान को अभिव्यक्ति देने की प्रक्रिया में किया जाने वाला भाषिक परिवर्तन ही भाषा का आधुनिकीकरण है। वैश्विकरण, उदारीकरण एवं निजीकरण के वर्तमान दौर में हिन्दी को एक व्यवसायिक भाषा के रुप में विकसित करना होगा। वैज्ञानिक, तकनिकी, औधोगिक एवं ज्ञान – विज्ञान के तमाम क्षेत्रो में साहित्य - निर्माण का कार्य आरंभ करना होगा। हिन्दी को अब केवल साहित्य कि भाषा न बनाकर आधुनिकीकरण की नई - नई चुनौतियों को स्वीकार करते हुए अधुनातन विषयों को सरल ढंग से समझने और समझाने के माध्यम की भाषा बनाना अनिवार्य हो गया है। आधुनिकीकरण के इस युग में विज्ञान चिकित्सा, तकनिकी, कृषि, जनसंचार, व्यापार – वाणिज्य, याता-यात, औधोगिक प्रतिष्ठान, वित्तीय प्रतिष्ठान, न्यायालय, प्रशासनिक कार्यालय आदि क्षेत्रों के कार्य – व्यवहार के उपयुक्त विविध भाषिक रुपों का विकास करना होगा। ज्ञान – विज्ञान के क्षेत्र में जो अतिशिघ्र और अद्भुत विकास हो रहा है, वह जनसामन्य तक शिघ्रता से नहीं पहुंच पाता है। इसे पहुंचाने का दायित्व हिन्दी भाषा पर है। अभी तक देश – विदेश में हो रही खोजों, अनुसंधानो, परिक्षणो तथा इन सबका लाभ और प्रयोजन जन साधारण को उपलब्ध कराना होगा। हिन्दी भाषा को जब हम प्रयोजनमूलक व जनोपयोगी बनाने की दॄष्टि से विकसित करेंगे, तभी उसका राष्ट्रिय महत्व एवं गौरव बढेगा। हमें ज्ञान – विज्ञान के लिए ही नही अपितु सामाजिक जीवन के समस्त क्षेत्रों में सर्वाधिक उपयोगी माध्यम के रुप में हिन्दी को प्रयुक्त करना होगा, तभी उसकी क्षमता और विकास की ऊन्नत दिशाएं प्रशस्त को पाएंगी।

हमारे भारतिय संविधान में यह संकल्पना की गई है की हिन्दी भारत की सामजिक संस्कृति की संवाहिका बने और उसका विकास इस संकल्पना को दॄष्टि में रखकर अन्य भारतीय भाषायी तत्वों को आवश्यकता के अनुसार आत्मसात करते हुए करना चाहिए। आधुनिक दॄष्टि से समृद्ध व प्रयोजनमूलक बनने के लिए हिन्दी को मुख्यतः संस्कृत से और गौणतः अंग्रेजी आदि अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करने चाहिए। आधुनिकीकरण की इस प्रक्रिया में हिन्दी को संविधान की भावना को भूलना नहीं होगा। हिन्दी भारतीय राष्ट्र की जन – जन की वाणी है। यह हमारी अस्मिता की उज्जवल पहचान और संस्कृति की अविरत संवाहिका है। यह उदात संदेश तभी सार्थक हो सकता है जबकि भारत के प्रत्येक कोनें में हिन्दी – चेतना स्फुरित व जागृत हो।

वैसे देखा जाए तो यह स्पष्ट होगा कि जिस भाषा का शब्द भंडार जितना अधिक होगा उस भाषा में जीवंतता उतनी अधिक लक्षित होगी। शब्द भाषा की ताजगी है। शब्द विन्यास से भाषा में लालित्य उत्पन्न होता है, जिससे संदेश देने में सुविधा होती है। यही संदेश मानव जिवन के बीच एक सोच पैदा करता है तथा उसकी पहचान बनाता है। चिन्तन मनन के क्षेत्र में भाषा का महत्व सबसे अधिक होता है।

उल्लेखनिय है कि किसी भी भाषा का साहित्य उस देश के अनुकुल होता है। इस संदर्भ मे आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी ने लिखा है “किसी भी देश के साहित्य का संबंध उस देश की संस्कृति परम्परा से होता है। भाषा में जो रोचकता और शब्दो में जो सौंदर्य का भाव रहता है वह उस देश की प्रकृति के अनुसार होता है”।

वैश्विकरण के कारण जो चुनौतियाँ हमारे सामने आई, उन चुनौतियों का सामना भी हमारे साहित्यकार और चिन्तकों ने डटकर किया। इससे हिन्दी में नयें नयें बिम्ब और प्रतिकों का आगमन हुआ। संघर्ष के करण लगातार गती पथ तीव्र होती गई और नये नये शब्दों को अपनाकर और इतर भाषा के श्ब्दो को अपनाकर हिन्दी की प्रयोगशील्ता को मजबूत बनाया गया। प्रो. जी. गोपीनाथ के अनुसार – “विश्व भाषा के रुप में हिन्दी का जो विकास हो रहा है, उसकए साथ कई अपेक्षाएं बढी है”। यह सच है कि भारत के बाहर हिन्दी का प्रचार काफी बढा है बाजारवाद ही इसका मुख्य कारण है” यह एक भ्रान्त धारणा है भाषा के विकास में साहित्यकारों की मुख्य भूमिका होती है। साहित्य सम्राट प्रेमचन्द्र के अनुसार, “ऊंचा साहित्य तभी आएगा, जब प्रतिभा संपन्न लोग तपस्या की भावना लेकर साहित्य क्षेत्र में आयेंगे, जब किसी अच्छी पुस्तक की रचना राष्ट्र के लिए गौरव की बात समझनी जाएगी”। अर्थात साहित्यकार राष्ट्र के गौरव होंगें। वैश्विकरण का सीधा – सादा अर्थ है – सम्पूर्ण दुनिया का एकमेव हो जाना। दुरियाँ सिमटकर बहुत छोटी हो जाना दुनिया के किसी भी कोने में होनेवाला परिवर्तन जिससे जनमानस प्रभावित होता है या हो रहा है उससे परिचित होना, विकास की गत्यात्म कहा को समझना, दुनिया से कदम मिलाकर चलना तथा नई – नई सूचना तकनीक के माध्यम से ज्ञान के विस्फोट को समझना और तेजी से प्रगतिशीलता के रुप में आगे बढना परिणामतः वैश्विकरण हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है और इसमें जिसका महत्वपूर्ण भाग है वह है भाषा। यह एक ऐसी सेतु है जो इस क्षेत्र में कदमों को मजबुती से टिकाए रखने के लिए अपने को लचिला, सरल, सहजग्राह्य बनना होगा। भले लोग इसे अच्छी तरह से बोल न पाते हो परन्तु समझतें अवश्य है। लोग इसे समझने और अपनाने लगे है।

विदेशो में पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, तिब्बत और अफगानिस्तान तथा मध्य एशयाई देशो में लाखों लोग हिन्दी बोलते, लिखते, समझते हुए मिल जाएंगे। इसके अलावा मॉरेशियस, फिजी, गुयाना, त्रिनिदाद में हिन्दी अपनी अच्छी पहचान बना चुकी है। भारतीय मूल के लगभग दो करोड लोग १३२ देशो में रहकर हिन्दी भाषा को संवाद भाषा बनाए हुए हैं। राष्ट्रभाषा हिन्दी को अन्तरराष्ट्रीय भाषा के रुप में बढावा देने में उन देशों की भूमिका बडी महत्वपूर्ण एवं प्रशंसनिय है, जिन देशों के विश्वविधालयों में हिन्दी एक विषय के रुप में पढाई जाती है और जहाँ उच्चस्तरीय शोध कार्य भी किया जा रहा है। विश्व के लगभग १६५ विश्वविधालयोंमें हिन्दी शिक्षण की व्यवस्था है। ऐसे देशो में जर्मनी, रुस, ब्रिटन, फ्रांस, ईटली, पोलेन्ड, हॉलेन्ड, अमरीका, जापान आदि का नाम उल्लेखनीय है। विश्व पटल पर दॄष्टि डालें तो हम पातें है कि हाल के कुछ वर्षों में विदेशो में हिन्दी की स्थिति में अति सुखद परिवर्तन आया है। अमरीका की मशहुर युनिवर्सिटी पेनसेल्विनिया युनिवर्सिटी ने एम. बी. ए. के छात्रों को हिन्दी का दो वर्षिय कोर्स अनिवार्य कर दिया है ताकी अमरिका को हिन्दुस्तान में बिजनेस बढाने में भाषा संबंधी दिकक्ते न आएं। ऐसे और अनेक उदाहरण है जिससे हिन्दी के महत्वपूर्ण उत्तरोतर प्रगति का पता चलता है।“मीडिया” आधुनिक समय के परिप्रेक्ष्य में शक्ति का प्रतीक बन गया है। भूमण्डलीकरण का बहुत अधिक श्रेय “मीडीया” को जाता है। प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रोनिक मीडिया और न्यु इलेक्ट्रोनिक मीडिया मुख्य माध्यम है जिसमें पत्रकार को काम करना पडता है।

(१) प्रिंट मीडिया के अन्तर्गत समचार पत्र- पत्रीकाएं, फोटोग्राफी, स्क्रिप्ट लेखन, अनुवाद, पुस्तक प्रकाशन, संपादन आदि आतें है।

(२) इलेक्ट्रोनिक मीडिया के अन्तर्गत संचार क्रांति का दौर, रेडियो, दूरदर्शन के कार्य क्षेत्र, एंकरिंग, मल्टीमीडिया, एनिमेशन, फिल्म निर्माण, वीडियोग्राफी आदि है और अन्य क्षेत्र में आतें है – विज्ञापन, जन संपर्क, लाईब्रेरी आदि आदि जिनमें हिन्दी का महत्वपूर्ण स्थान है।

सिनेमा, दूरसंचार, दूरदर्शन, नाटक, रेडियो सूचना प्रौध्योगिकी आज दुनिया की सबसे बडी क्रांति मानी जाती है और इन सभी का माध्यम हिन्दी है। टी.वी. में प्रसारीत होनेवाले सभी कार्यक्रम हिन्दी में प्रसारित होते है और भारत के साथ साथ विश्वभर में इन हिन्दी चेनलों का देखनेवालों की संख्या दिन न व दिन बढ रही है। अतः कहा जा सकता है की इलेक्ट्रोनिक मीडिया दूरदर्शन, रेडियो, वीडियो, पत्रिकाओं व सेटेलाईट चैनलो के कारण देश – विदेश, शहर, गाँव सब एक सूत्र में बंध गए। जिस्का श्रेय मुख्यतः हिन्दी भाषा को जाता है। यह हिन्दी के लिए महत्वपूर्ण है। भूमंडल पर साहित्य, कला, प्रौध्योगिकी, चिकित्साशास्त्र, अर्थशास्त्र, धर्म – दर्शन, समाज विज्ञान, राजनीतिक विज्ञान, गणित आदि ज्ञान – विज्ञान के क्षेत्रों में हुई प्रगति का विवरण हमें अनुवाद द्वारा ही मिल सकता है। हिन्दी तथा अन्य भाषा साहित्य और विश्व साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए अनुवाद आवश्यक है। अतः इस क्षेत्र में अनुवाद रोजगार का साधन बनाया जाए। स्तर एवं गरिमा के अनुसार ही इंजीनियरींग, मेडिकल, आर्किटेक्ट, ड्राफ्टमेन, आयुर्वेद, फार्मसी, विधि, गणित, खगोलविज्ञान, मनोविज्ञान, प्रौध्योगिकी, पदार्थ विज्ञान, रसायन विज्ञान, कृषि विज्ञान, भू विज्ञान, मानव विज्ञान, गृहविज्ञान आदि अनेक क्षेत्रो के हिन्दी अनुवाद कार्य हिन्दी अनुवादकों के रोजगार का नवीन स्त्रोत बन सकता है।

तकनीकी और प्रौध्योगिकी के विकास के साथ ही मशीनी अनुवाद के क्षेत्र में परिवर्तन आया है। कम्प्युटर का विकास होने से हिन्दी भाषा का क्षेत्र विकसित हुआ है। नागरी लिपी का कम्प्युटर पर उपलब्ध होना उसके जाननेवालों में तीव्रता लाया है। इंटरनेट का प्रयोग करके लोगों को हिन्दी भाषा और साहित्य के बारे में आसानी से जानकारी प्राप्त हो रही है। साहित्य लेखन के क्षेत्र में भी कम्प्युटर ने योगदान दिया है। कई नये हिन्दी भाषा से संबंधित सोफ्टवेयर तैयार किए जा रहें हैं जो भविष्य में हिन्दी भाषा के प्रसार में सहायक सिद्ध होंगें। लेकिन कुछ समस्याओं का हल अभी पूर्णत; से नही हो पाया है। जैसे वैज्ञानिक क्षेत्रो के पारिभाषिक शब्दों का अनुवाद, मौलिक ग्रन्थों का अभाव, टंकण की समस्या इत्यादी। इन समस्याओं को भविष्य में सुलझाने की संभावना है। परन्तु इन सम्स्याओं से भी बडी समस्या हमारे लिए हमारी हिन्दी भाषा के प्रति मानसिकता की समस्या है। कुछ लोग हिन्दी का इतना विशाल क्षेत्र होते हुए भी हिन भावना से ग्रस्त रहते हैं। उनकी सोच में हिन्दी भाषा में कुछ नहीं है। हिन्दी किसी योग्य नहीं है, सारी समस्याओ की जननी यही हिन भावना है। जिससे हमें उबरना है|

आने वाले समय में निःसंदेह हिन्दी का और अधिक विकास होगा, प्रचार – प्रसार होगा और समृद्ध होगा। व्यवहार में हिन्दी का ज्यादा शुद्ध प्रयोग तथा अपने गौरवशाली परंपरा से जोडे रखना प्रमुख होगा। इसके लिए शैक्षिक और सामाजिक्स्तर पर हिन्दी में आए बदलाव के साथ – साथ उसके वास्तविक रुप से ज्यादा से ज्यादा प्रयोग जरुरी है, तभी हिन्दी अपनी प्रतिभाशीलता के साथ साथ अपनी खुद की पहचान के रुप में समृद्ध रहेगी तथा विश्व जनमानस के दिलों पर राज करेगी।

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