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वर्ष: 2, अंक 26, दिसम्बर(प्रथम), 2017



सरकारी अस्पतालों में
चिकित्सकों की अनुपलब्धि


डाॅ. कौशल किशोर श्रीवास्तव


सामान्यतः मरीजों की यह शिकायत रहती है कि अस्पतालों के बाहृय रोगी विभाग में चिकित्सक उपलब्ध नहीं रहते, बाहृय रोगी विभाग में विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं रहते, वार्ड मंे चिकित्सक राउण्ड नहीं लगाते, महिला रोग विशेषज्ञ या तो गर्भवती माताओं को भरती नहीं करतीं उनका परीक्षण नहीं करती, जचकी के समय सीजेरियन आपरेषन नहीं करती या अनावष्यक सीजर आपरेशन नहीं करतीं, शल्य क्रिया विशेषज्ञ शल्य क्रिया नहीं करते, अल्ट्रासोनोग्राफीज नहीं होती, एम.एल.सी. रिपोर्ट सहीं समय पर नहीं देते, मरणोपरांत जाचों के लिये देर से उपलब्ध होते हैं, मरीज का संतोषजनक समाधान नहीं करते, एकनिश्चितसमय के पष्चात् जाँच के लिये सेंपल नहीं लिये जाते, ब्लड बैंक में या तो व्यापार होता है या रक्त उपलब्ध नहीं होता, परची बनाने वाले उपस्थित नहीं रहते, वार्डब्वाय स्ट्रेचर खींचने उपलब्ध नहीं होते हैं षौचालयों या पूरे अस्पतालों में ही गंदगी रहती है, बाजार की दवाईयाँ लिख दी जाती हैं, अस्पताल में आकस्मिक औषधियां उपलब्ध नहीं रहतीं, चिकित्सकों का व्यवहार अपमानजनक रहता है इत्यादि।

यहाँ एक एक कर प्रत्येक बिन्दु का विश्लेषण किया जायेगा। जिन बिन्दुओं का समाधान एक सा होगा उन्हंे एक साथ ले लिया जायेगा।

(1) चिकित्सकों द्वारा प्राइवेट प्रेक्टिसः- यह सही है कि चिकित्सालयीन समय में कुछ चिकित्सक स्वयं की प्रेक्टिस उनके प्राइवेट अस्पतालों में करते हैं। यदि उनके विरूद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही की जाये तो सारे चिकित्सक एक होकर हड़ताल पर जाने की धमकी देने लगते हैं। कुछ चिकित्सक जन प्रतिनिधियों से संबंध बनाकर रखते हैं। यदि उन पर अनुशासनात्मक कार्यवाही की जाये तो वे प्रशासक चिकित्सक पर अप्रत्यक्ष दबाव बनाने लगते हैं। ऐसे प्रषासकों पर स्थानीय या मंत्रीमंडलीय जन प्रतिनिधियों के दण्डात्मक दूरभाष आने लगते हैं जिसमें प्रषासकों का स्थानांतरण या निलम्बन प्रमुख है। कई चिकित्सकों के प्राइवेट चिकित्सालय जाने के लिये अधीनस्थ स्टाफ द्वारा उनके गृह के चिकित्सालय में जाने के लिये दबाव दिया जाने लगता है। कुछ चिकित्सक मरीजों और उनके रिष्तेदारों से चिकित्सालय में तो दुवर््यवहार करते हैं पर जब मरीज उनके घर भारी षुल्क दे देता है तो ऐसे चिकित्सकों का व्यवहार विनम्र हो जाता है। कुछ चिकित्सकों ने समानान्तर स्वयं को चिकित्सालय बना रखे हैं। क्षय रोग चिकित्सकों के घर पर क्षयरोग मषीनें लगीं हुई होती हैं। जाने क्यों अस्पताल की डिजीटल एक्स रे या सी.टी.स्केन मषीनें अक्सर खराब रहतीं है पर उनकी चलती रहती हैं। पैथोलाॅजी विभाग के चिकित्सकों की स्वयं की प्रयोगशालाये रहती हैं। ऐसे सारे चिकित्सक मरीजों को उनके प्रायवेट चिकित्सालय आने के लिये विवष करते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि कुछ चिकित्सक अत्यंत लालची होने के कारण असहाय मरीजों से अमानवीय व्यवहार करते हैं।

(2) चिकित्सकों की न्यायालयों में गवाहीः- कुछ चिकित्सकों की न्यायालयों में प्रतिदिन गवाही रहती है। कुछ न्यायालय उन्हें अपरान्ह पूर्व ग्यारह बजे ही न्यायालय में हाजरी देने को कहते हैं। कहीं कहीं तो उन्हें दिनभर ही स्वयं की गवाही का इंतजार करना पड़ता है ऐसे प्रकरणों में गम्भीर मरीज उनका इंतजार करते करते मर जाते हैं विशेषकर दूरस्थ स्थानों के चिकित्सकों के स्थानों के मरीज। अतः उच्च न्यायालयों को कोई ऐसी विधि ईजाद करना चाहिये जिससे मरीजों का हित हो सके। मैंने ऐसे चिकित्सक भी देखे हैं जिन्हें एक ही तारीख में चार चार न्यायालयों में गवाही देना पड़ी । इन तथ्यों पर न्यायालय यह तर्क देने लगते हैं कि कुछ चिकित्सक बार बार समन करने पर भी गवाही देने नहीं आते बेषक ऐसे चिकित्सकों पर कार्यवाही होना चाहिये।

(3) व्ही.आई.पी. ड्यूटीः- क्या आपने कभी यह बात ध्यान में लाई कि जिला चिकित्सालयों में प्रतिदिन ही कोई न कोई उप संचालक, संयुक्त संचालक, संचालक, उप सचिव, सचिव, या जिलाध्यक्ष तक निरीक्षण के लिये आते रहते हैं सब अपेक्षा करते है कि चिकित्सकों का पूरा अमला उनके साथ हो। फिर मंत्री लोग तो प्रतिदिन ही जिले में आते रहते हैं जो अपेक्षा करते हैं कि जिलाध्यक्षों से लेकर एम्बुलेंस सेवायें तक उनके पीछे लगीं रहें। दिन भर चिकित्सक भूखे प्यासे एम्बुलेंस में बैठे रहते हैं। एक स्थानीय विधायक तक उनके जन सम्पर्क के दौरान एम्बुलेंस ड्यूटी की अपेक्षा उनके पीछे लगाते थे।

(4) रोग निदान शिविरः- कई जन समस्या निवारण शिविरों में रोग निदान शिविर भी लगा दिये जाते हैं। कभी-कभी ऐसी परिस्थितियाँ भी उत्पन्न हुई है कि प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में मात्र दो चिकित्सक होने के कारण एक रोग निदान शिविर और दूसरे को न्यायालय जाना पड़ता है। इस तरह प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र खाली हो जाता है। कई समाज या समाज सेवी संस्थायें इस तरह के शिविर स्वयं का महत्व बताने के लिये शिविर रख देते हैं। वह भी षासकीय चिकित्सालय से मात्र कुछ कदम दूरी पर। कुछ संस्थायें तो धार्मिक भण्डारों में एम्बुलेंस सेवायें चाहती है, इन स्वयंसेवी संस्थाओं के रोग निदान शिविरों में चिकित्सक भी सरकारी होते हैं एवं दवाईयाँ भी सरकारी होती हैं। उनका मात्र ‘बैनर’ ही रहता है।

मैं ऐसे में पुलिस की एम्बुलेंस सेवा की प्रशंसा करने से स्वयं को रोक नहीं पा रहा हूँ उनकी सेवायें भी मैंने मुस्तैद देखी है।

समाधान

(1) सामान्य प्रबन्धकः- आज से लगभग चालीस वर्ष पूर्व मैंने ‘सरिता’ में सुझाव दिया था कि चिकित्सालयों में सामान्य प्रषासक रखे ही जाने चाहिये। इस सुझाव का स्वार्थी चिकित्सकों से प्रबल विरोध की सम्भावना है पर यह कड़वी दवा तो जनता को पीनी ही पड़ेगी। चिकित्सकों की एक ही धमकी रहती है कि वे हड़ताल पर चले जायेंगे। षासन को भी कठोर होकर त्वरित कार्यवाही करना पड़ेगी।

आई.एम.ए. इस कदम का विरोध कर सकती है, पर आई.एम.ए. एक कागज का शेर ही है। अधिक से अधिक यह संस्था काली पट्टी बांधकर विरोध प्रदर्षन ही कर सकती है।

(2) प्राइवेट प्रेक्टिस पर रोेकः- क्या एक जज या जिलाधीष को इस तरह की कोई सुविधा है? यदि नहीं तो षासकीय चिकित्सालयों के चिकित्सकों को ही यह सुविधा क्यों दी गई है? जनहित में इस पर रोक लगाना आवष्यक है।

(3) त्वरित कार्यवाहीः- किसी चिकित्सक के विरूद्ध शिकायत करने पर या तो चिकित्सक से स्पष्टीकरण पूछ लिया जाता है या चेतावनी दे दी जाती है। यह अनुचित है? जनशिकायत पर त्वरित कार्यवाही होनी चाहिये जैसी कि जजों के विरूद्ध होती है।

(4) केन्द्रीय स्वास्थ्य सेवाः- सिविल सर्जन एवं सी.एम.एच.ओ. का पद भारतीय स्वास्थ्य सेवा के तहत् जिलाध्यक्ष के समकक्ष होना चाहिये, अन्यथा प्रभारी सिविल सर्जन के एवं सी.एम.एचों के करण ये सेवायें लचर ही रहेंगी। संविधान में भी सिविल सर्जन को जिलाध्यक्ष एवं पुलिस अधीक्षक के समकक्ष ही रखा है। मालूम नहीं यह पद एक लचर पद बना दिया गया यह अनुषंसा भी मैंने चालीस वर्ष पूर्व सरिता में की थी।

(5) फालतू के शिविरः- इस पर एम्बुलेंस या चिकित्सकों या सरकारी दवाइयों की अनिवार्यता पर रोक लगानी चाहिये। ये रोग निदान शिविर चिकित्सकों की सेवाओं, एम्बुलेंस की सेवाओं, या सरकारी औषधियों का अपव्यय है।

(6) न्यायालयों में गवाहीः- जनहित में यह समस्या न्यायालयों को ही हल करना है।

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