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वर्ष: 2, अंक 26, दिसम्बर(प्रथम), 2017



आग


शशांक मिश्र भारती






बेघर सरिता कड़कड़ाती ठण्डक में विवशता से इधर-उधर भटक रही थी कहीं आग दिख जाये, तो उसी के सहारे रात कट जायेगी।

अभी वह जाकर चैराहे पर आग सेंकने बैठी ही थी कि एक फौलादी हाथ उसको अपने कमरे में घसीट ले गया और अपनी आग शान्त करने लगा।






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