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वर्ष: 2, अंक 26, दिसम्बर(प्रथम), 2017



बेबसी


सविता मिश्रा "अक्षजा"


"सालों पहले की ही तो बात है, घर कितना गुलजार रहता था। कभी बच्चों के दोस्त, कभी आपके महकमे के दोस्त। कभी मेरी अपनी पहचान के लोग या फिर पड़ोसी, जुटे ही रहते थे |"

"हाँ, और मोबाईल नम्बर तो मांग ही लेते थे |" कहकर मुस्करा पड़ा कुछ याद करके |

"मोबाईल तो दिन देखता था न ही रात | जब मन होता था घनघना उठता था। नये-नये बने रिश्तेदारों के फोन तो हर दूसरे दिन आ ही जाते थें।" पत्नी ने समर्थन में आगे कहा |

" पर अपने बच्चे!"

"बच्चे भविष्य की राह पर गये तो पलटकर आना तो था नहीं | लेकिन उनके फोन ...!" लम्बी साँस छोड़कर पत्नी बोली |

"मेरा फोन भी जल्दी ही काट देती थी तुम! कहकर कि बच्चों के फोन आने का समय हो रहा।" पति ने ठुड्ढी पकड़ते हुए कहा।

"हाँ, शुरू में उनका भी तो फोन सुबहों -शाम कानों में सुरीली बाँसुरी सा कई बार बजता था। लेकिन...!" बच्चों को यादकर आद्र कंठ से बोली |

"लेकिन बाद में धीरे-धीरे फोन आने कम हों गये, फिर बन्द ही हो गए।" स्वर की निराशा दुःख बयाँ कर रही थी|

"हाँ, कभी कभार मिलाओ तो थोड़ी सी बात करके "विजी हूँ माँ " कहकर काट देते थें। अब तो महीनों से मोबाईल गुनगुनाया ही नही।"

"पहले तुम रोज अपना मोबाईल उठा के देखती थी फिर हफ्ते में ! अब महीनों से छुआ ही नहीं तुमने उसे |" कोने में दुबके हुए मोबाईल पर अछूत सी दृष्टी डालकर पत्नी से कहा |

"हाँ, सब के नम्बर निहारती रहती थी | किसको मिलाऊँ..देखती थी! कोई जेहन में न आता था जिसने मुझे याद किया हों।"

पिता ने ठंडी श्वास छोड़ते हुए कहा - "मेरे मोबाईल से अपने ही नम्बर को जब-तब डायल करके सुन लेती थी न ! मुझसे छिपी नहीं है यह बात |"

बात करते-करते हाथ में मोबाईल उठायी और एक-एक करके सारे नम्बर दोनों मोबाईल से डिलीट कर दी। अब मोबाईल में सिर्फ एक दुसरे का नम्बर चमक रहा था।

दोनों मियां-बीवी अपने ही नम्बर को जब-तब डायल करके डायल-टोंन सुन लेते थे और हँसकर एक दुसरे से कहते - "देखो, तुम्हें कोई तुम्हारा अपना याद कर रहा है |"

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