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वर्ष: 2, अंक 26, दिसम्बर(प्रथम), 2017



आदमखोर होता आदमी


सुशील शर्मा


गर झांक कर देखोगे 
पास से आदमी।
नजर आएगा आदमखोर 
होता आदमी।
खुद को खुद से 
निगलता है
अपनी ही मौत की 
चालें चलता है।
घूंट घूंट खुद का 
खून पीता है।
खुद का गोश्त 
खा खा कर जीता है।
अहंकार के चूल्हे पर 
खुद को पकाता है।
दुख दर्द तनाव 
बड़े चाव से खाता है।
अपेक्षाओं की आरी 
संबंधों पर चलाता है।
संबंधों के टुकड़ों को अपने
 हाथी के दांतों से चबाता है।
लोभ लालच की मिठाई में
 असीम इच्छाओं का तड़का है।
खुद को खाने का शौक 
देखो कैसा भड़का है।
आदमियत के मुखोटे 
लगा कर घूमता है।
खुद को खा खा कर 
खुशी से झूमता है।
आधुनिकता के पिज्जे में 
बेशर्मी का चीज डाल कर।
अपनी एक एक बोटी खाता है
 संभाल संभाल कर।
माँ को तो स्तन से बचपन 
से ही खा रहा है।
अन्य संबंधों को भी 
अनजाने में गवां रहा है।
लोग शेर को आदमखोर 
कहते है।
इस शहर में भी सब 
आदमखोर रहते हैं।
शेर तो आदमी खा कर 
अपनी भूख मिटाते हैं।
ये आदमखोर दूसरों के 
साथ स्वयं को भी खाते है।
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