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वर्ष: 2, अंक 26, दिसम्बर(प्रथम), 2017



नदी का स्वाभिमान


सुधीर सिंह सुधाकर


 
तुमने मुझको बर्बाद किया 
मैं कुछ न बोली 
तुमने मुझ से न जाने कौन से 
जन्मों का बदला लिया 
मैं फिर न कुछ बोली 
जब मैं जन्मी थी 
क्या तुमने देखा था मुझे नहीं न ? 
फिर मेरे जन्म होने के सवाल को लेकर 
तुमने कैसे ऊँगली उठाई ?
तुम अपने साथ गन्दगी लाते 
और मुझे सौंप चल देते 
मैं तो फिर भी कुछ न बोली 
तुमने मेरी धारा बदलनी चाही 
अपने स्वार्थ के लिए 
मेरे सीने पर नश्तर चलाया 
मुझे विभाजित करने का प्रयास किया 
मैं तुमसे क्या कुछ बोली ?
तुमने हमेशा ही मेरा शोषण किया 
मेरा रूप धवल था 
तुमने उसे कालिख सामान बना डाला 
कभी मेरे कलरव से तुम्हारा 
दिन अच्छा गुजरता था 
शाम ढले तुम मुझे निहाराने आ जाते थे
पहले मैं तुम्हारे इतिहास की गौरव थी 
आज तुमने मुझे दो हिस्सों से लेकर 
न जाने कितने हिस्सों में बाँट दिया है 
दिन रात सहती हूँ तुम्हारे सभी जुल्म 
पर पलट कर भी कुछ नहीं कहती 
तुम्हारे करनी की सज़ा तुम्हें मिली 
तुमने पेंड काटे मेरा रास्ता बदला 
बताओ क्या कराती तब मैं ?
मेरे रास्तों पर तुमने अपने लिए घर बनाये 
क्या करती मैं तब ?
बादल मेरे ऊपर पूरा जल लेकर बरस पडा 
क्या कराती तब मैं ?
काश मेरा रूप न बिगाड़ा होता तुमने 
रहने दिया होता मुझे अपने ही राहों में 
तो शायद जल प्रलय न आता 
मैं सब कुछ न बहा ले जाती 
बोया तुमने था फल तो मिलना था 
इतने के बाद भी कहाँ चेते हो तुम 
अब नही तुम वैसे ही ..........
अब भी तुम वैसे ही हो .........
  
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