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वर्ष: 2, अंक 26, दिसम्बर(प्रथम), 2017



समझौता


रश्मि सुमन


 
उड़ाया है कई कई बार
गुब्बारे समझौतों के
उड़ते ही डोरी हाथों से छूट गयी,
उड़ते उड़ते गुब्बारे ने कहा
बिन मेरे (समझौतों के)
ज़िन्दगी कोई ज़िन्दगी है??

जब होगी मेरी मान-मनुहार
तभी आऊँगी तेरे द्वार
सुन लो! एक पते की बात
बिन मेरे ज़िन्दगी
की क्या बिसात??

यहाँ सच, झूठ के कपड़ों से ढँका है,
क्या इससे बढकर कोई कुरूपता है?
न आवरण हटते हैं,
न ही संस्कार
न ही मोह,न ही बिछोह
बस!!
यहाँ सब कुछ है प्रयोजनयुक्त

ऐसे में बिन मेरे (समझौतों के),
खुशहाल जीवन की कामना कोरी है,
अभी भी मेरी बात अधूरी है

मैं था, तो ही थे
रिश्ते नाते थे
अपने पराये थे
उन रिश्तों में प्यार था
त्याग व समर्पण था

अब न तो ख्वाइशें होगी
न ही किसी से  रंजिशें होंगी

मेरे बिन इंसान ऐसा
जैसे वृक्ष से हो टूटी टहनी कोई....

जब जब संवेदनाओं से दूर हुआ है आदमी,
तब तब समझौतों के गुब्बारे उसके हाथ से जा छूटे हैं

है ना?????
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