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वर्ष: 2, अंक 26, दिसम्बर(प्रथम), 2017



एक निवाले की खातिर


नरेश गुज्जर


 
एक निवाले की खातिर दर दर की ठोकर खाती है
जब एक बूढ़ी अम्मा अपने ही घर से निकाली जाती है
सिंचा था अपने लहू से उन पौधों को जिन्हें औलाद कहते है
आज उस औलाद से ही फिर क्यों वो धूतकारी जाती है
क्या क्या ना किया इन बच्चों के लिए 
और कौन से दुख थे जो सहे नही
ठोकर खाती है, है गिरती कहीं
नंगे पाँव ही काँटों पर चलती रही
भूख लगी पर अन्न नहीं, घर घर भटकी ना पानी मिला
नजर से बचाता जिसका काजल था
जो करता छाया वो उस माँ का आँचल था
मारे दर्द के कराहती है , दर दर की ठोकर खाती है 
जब एक बूढ़ी अम्मा अपने ही घर से निकाली जाती
था मंदिर मस्जिद माँगा जिसको
किए जिसकी खुशी के लिए दान
आज उसी मंदिर के बाहर बैठी वो भीख रही है माँग
फिर भी गीत ममता के गाती है, 
जुग जुग जिये लाल मेरा एेसा आर्शिवाद दे जाती है
एक निवाले की खातिर दर दर की ठोकर खाती है
जब एक बूढ़ी अम्मा अपने ही घर से निकाली जाती है
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